हिंदी सिनेमा में प्रचलित यथार्थवादी और व्यावसायिक धाराओं के बीच की दूरी को पाटते हुए लोकप्रिय फ़िल्में बनाने वाले बिमल राय बेहद संवेदनशील और मौलिक फ़िल्मकार थे। बिमल राय का नाम आते ही हमारे ज़हन में सामाजिक फ़िल्मों का ताना-बाना आँखों के सामने घूमने लगता है। उनकी फ़िल्में मध्य वर्ग और ग़रीबी में जीवन जी रहे समाज का आईना थीं। चाहे वह ‘उसने कहा था’ हो, ‘परख’, ‘काबुलीवाला’, ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘बंदिनी’, ‘सुजाता’ या फिर ‘मधुमती’ ही क्यों ना हो। एक से बढ़कर एक फ़िल्में उन्होंने फ़िल्म इण्डस्ट्री को दी हैं।
बिमल राय ‘चैताली’ फ़िल्म पर काम कर ही रहे थे, लेकिन 1966 में 7 जनवरी को मुंबई, महाराष्ट्र में कैंसर के कारण इनका निधन हो गया। बिमल राय भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उन्होंने फ़िल्मों की जो भव्य विरासत छोड़ी है वह सिनेमा जगत् के लिए हमेशा अनमोल रहेगी।
हमारी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
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