भारत विभिन्नताओं का देश है। यहां एक ही त्योहार अलग अलग तरीकों से मनाया जाता है। आज विजयादशमी है, आज ही के दिन भगवान राम ने असुर रावण का वध किया था और धरती को उसके उत्पातों से मुक्त कराया था। भारत के विभिन्न हिस्सों में रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की इस जीत का जश्न पूरी दुनिया मनाती है। माना जाता है कि रावण बहुत बड़े विद्वान थे व शिव जी के बहुत बड़े भक्त थे। इसी वजह से भारत में कई जगहों पर उनके नाम के मंदिर हैं जहां रावण को भगवान मानते हैं। आइए आज जानें कि विविधता भरे भारत मे कहाँ कहाँ रावण को पूजा भी जाता है।
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के जसवंतनगर को राजनीतिक कारणों से जाना जाता है। यहां दशहरे वाले दिन रावण की पूरे शहर में आरती उतारकर पूजा की जाती है। उसके बाद रावण को मार-मारकर टुकड़े कर दिए जाते हैं। फिर वहां मौजूद लोग रावण के उन टुकड़ों को उठाकर घर ले जाते हैं। यहां उसकी मौत के तेरहवें दिन तेरहवीं भी की जाती है!
उत्तर प्रदेश कानपुर औद्योगिक दृष्टि से अलग स्थान रखता है। यहां के शिवाला क्षेत्र में मौजूद है दशानन मंदिर। साल में सिर्फ एक ही बार दशहरा के दौरान इस मंदिर के द्वार खोले जाते हैं। मंदिर में मौजूद रावण की मूर्ति का श्रृंगार कर आरती उतारी जाती है। सिर्फ इसी एक दिन भक्तों को मंदिर में आने की अनुमति होती है। भारी भीड़ में यहां लोग रावण के दर्शन के लिए आते हैं। लोगों की मान्यता है कि 1890 में बने इस मंदिर में तेल के दिए जलाने से मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
मध्यप्रदेश के मंदसौर में भी रावण की पूजा की जाती है। इस जगह मौजूद मंदिर को मध्य प्रदेश में बना रावण का पहला मंदिर माना जाता है। यहां रावण रुण्डी नाम से रावण की विशाल मूर्ति भी मौजूद है, जिसकी पूजा की जाती है। महिलाएं इस मूर्ति के सामने से घूंघट करके निकलती हैं। मान्यताओं के अनुसार रावण को मंदसौर का दामाद माना जाता है। मंदोदरी के नाम पर ही इस जगह का नाम मंदसौर पड़ा।
कर्नाटक के कोलार में लंकेश्वर महोत्सव (फसल महोत्सव) आयोजित किया जाता है। यहां लंकेश्वर महोत्सव के दौरान रावण की पूजा के साथ-साथ जुलूस भी निकाला जाता है। जुलूस में रावण के साथ भगवान शिव की मूर्ति को भी घुमाया जाता है। मान्यता है कि रावण के भगवान शिव का परम भक्त होने के चलते यहां रावण की पूजा की जाती है। कोलार के लिए मंडया जिले में मालवल्ली तहसील में रावण का एक मंदिर भी है।
मध्यप्रदेश के विदिशा को मंदोदरी का जन्म स्थान मानते हैं। दशहरे के दिन लोग यहां मौजूद 10 फीट लंबी रावण की प्रतिमा की पूजा करते हैं। इसके साथ ही शादियों जैसे शुभ अवसर पर भी इस मूर्ति का आर्शीवाद लेते हैं।
उज्जैन जिले के चिखली गाँव में ऐसी मान्यता है कि यदि रावण को पूजा नहीं गया तो पूरा गांव जलकर भस्म हो जाएगा। इसीलिए इस गांव में भी रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि दशहरे पर रावण की पूजा होती है। गांव में ही रावण की विशालकाय मूर्ति स्थापित है।
जोधपुर शहर में भी रावण का मंदिर है। यहां के दवे, गोधा और श्रीमाली समाज के लोग रावण की पूजा-अर्चना करते हैं। ये लोग मानते हैं कि जोधपुर रावण की ससुराल थी तो कुछ मानते हैं कि रावण के वध के बाद रावण के वंशज यहां आकर बस गए थे। ये लोग खुद को रावण का वंशज मानते हैं।
महाराष्ट्र के अमरावती और गढ़चिरौली जिले में कोरकू और गोंड आदिवासी रावण और उसके पुत्र मेघनाद को अपना देवता भी मानते हैं। अपने एक खास पर्व फागुन के अवसर पर वे इसकी विशेष पूजा करते हैं।
आंध्रप्रदेश के काकिनाड नामक स्थान पर भी रावण का मंदिर बना हुआ है, जहां भगवान शिव के साथ उसकी भी पूजा की जाती है। यहां पर विशेष रूप से मछुआरा समुदाय रावण का पूजन अर्चन करता है। यहां के लेकर उनकी कुछ और भी मान्यताएं हैं।
दक्षिण भारत में रावण को विशेष रूप से पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि रावण परम ज्ञानी, पंडित, शिवभक्त था। दक्षिण भारत के कुछ स्थानों पर रावण के इन्हीं गुणों के कारण वह पूजा जाता है। वे रावण दहन को दुर्गुणों का दहन मानते हैं।
उत्तरप्रदेश में गौतमबुद्ध नगर जिले के बिसरख गांव में भी रावण का मंदिर बना हुआ है। मान्यता है कि गाजियाबाद शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर गांव बिसरख में रावण का जन्म हुआ था। इस गांव का नाम पहले विश्वेशरा था, जो रावण के पिता विश्रवा के नाम पर पड़ा।
राजस्थान के जोधपुर में मंडोर है, इस जगह को रावण का ससुराल माना जाता है। यहां रावण की पहली पत्नी मंदोदरी को बेटी मानते हैं। इसके अलावा यहां मौजूद श्रीमाली ब्राह्मण समाज के लोग रावण की कुलदेवी खरानना की पूजा करते हैं और खुद को रावण का वंशज बताते हैं। मंडोर में रावण और मंदोदरी का मंदिर भी है। दशहरे के दिन रावण की मृत्यु और मंदोदरी के विधवा होने की वजह से यहां के लोग विजय दशमी के दिन शोक मनाते हैं।
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