20 अप्रैल : आज ही के दिन नही रहे थे शकील बदायूंनी

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शकील बदायूंनी का लिखा ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज’ भारत की आत्मा का प्रतीक माना जाता है। इस भजन को शकील बदायूंनी ने लिखा था। संगीत दिया था नौशाद ने और गाया था मुहम्मद रफ़ी साहब ने।

‘चौदहवीं का चांद’ पिक्चर का पहला गाना रिकॉर्ड किया जाना था। गुरु दत्त बैचैन थे और उनसे भी ज़्यादा स्टूडियो के कोने में कुर्सी पर बैठे हुए शकील बदायूंनी। संगीतकार रविशंकर शर्मा उर्फ़ ‘रवि’ दोनों की बैचैनी को बड़ी अच्छी तरह से समझ रहे थे। दरअसल, ‘कागज़ के फूल’ फ्लॉप हो चुकी थी। गुरुदत्त और बर्मन दा की जोड़ी टूट चुकी थी और उधर शकील भी पहली बार नौशाद के प्रभाव से बाहर निकलकर किसी नए संगीतकार से जुड़े थे।

शकील: ‘भाई रवि, सब ठीक तो रहेगा?’

रवि: ‘फ़िक्र न करो. बस तुम धीरज रखो।’

गुरुदत्त ने इन दोनों की बातचीत को सुना तो घबराकर कहा : ‘अरे शोंगीत जोदि भालो न होये तहोले सिनेमा फ्लॉप कोरे जाबे। शोकील तुमी बदायूं चोले जाओ। रोबी तुमी दिल्ली चोले जाओ..आर आमि डूबे मोरी’।

रवि ने हंसकर कहा. ‘दादा, शोब भालो होबे। तुमी चिंता कोरो ना’

पिक्चर हिट हो जाती है, रवि को बेस्ट म्यूजिक कंपोजर का अवार्ड मिलता है और शकील के हिस्से में पहली कामयाबी आती है। उन्हें ‘चौदहवीं का चांद हो या अफताब हो जो भी तुम ख़ुदा की कसम लाजवाब हो..’ के शीर्षक गीत के लिए 1961 में बेस्ट गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड मिलता है। फिर इसके बाद लगातार आने वाले दो साल यानी सन ‘62 में फिल्म ‘घराना’ और सन ‘63 में फिल्म ‘बीस साल बाद’ के गानों के लिए फिल्मफेयर अवार्ड उनकी झोली में आता है।

आज ही के दिन 1970 में वे नहीं रहे थे। हमारी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।