शाहजहाँ के शासन−काल में मुग़ल साम्राज्य की समृद्धि, शान−शौक़त और ख्याति चरम सीमा पर थी। उनके दरबार में देश−विदेश के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्ति आते थे। वे शाहजहाँ के वैभव और ठाट−बाट को देख कर चकित रह जाते थे। उनके शासन का अधिकांश समय सुख−शांति से बीता था; उनके राज्य में ख़ुशहाली रही थी। उनके शासन की सब से बड़ी देन उनके द्वारा निर्मित सुंदर, विशाल और भव्य भवन हैं। उनके राजकोष में अपार धन था। सम्राट शाहजहाँ को सब सुविधाएँ प्राप्त थीं।

शाहजहाँ ने सन् 1648 में आगरा की बजाय दिल्ली को राजधानी बनाया; किंतु उन्होंने आगरा की कभी उपेक्षा नहीं की। उनके प्रसिद्ध निर्माण कार्य आगरा में भी थे। शाहजहाँ का दरबार सरदार सामंतों, प्रतिष्ठित व्यक्तियों तथा देश−विदेश के राजदूतों से भरा रहता था। उसमें सबके बैठने के स्थान निश्चित थे। जिन व्यक्तियों को दरबार में बैठने का सौभाग्य प्राप्त था, वे अपने को धन्य मानते थे और लोगों की दृष्टि में उन्हें गौरवान्वित समझा जाता था। जिन विदेशी सज्ज्नों को दरबार में जाने का सुयोग प्राप्त हुआ था, वे वहाँ के रंग−ढंग, शान−शौक़त और ठाट−बाट को देख कर आश्चर्य किया करते थे। तख्त-ए-ताऊस शाहजहाँ के बैठने का राजसिंहासन था।

शाहजहाँ 8 वर्ष तक आगरा के क़िले के शाहबुर्ज में क़ैद रहे। उनका अंतिम समय बड़े दु:ख और मानसिक क्लेश में बीता था। उस समय उनकी प्रिय पुत्री जहाँआरा उनकी सेवा के लिए साथ रही थी। शाहजहाँ ने उन वर्षों को अपने वैभवपूर्ण जीवन का स्मरण करते और ताजमहल को अश्रुपूरित नेत्रों से देखते हुए बिताये थे। अंत में 22 जनवरी, सन् 1666 में उनका देहांत हो गया। उस समय उनकी आयु 74 वर्ष की थी। उन्हें उसकी प्रिय बेगम के पार्श्व में ताजमहल में ही दफ़नाया गया था।

ताजमहल जैसी विश्व प्रसिद्ध इमारत देने वाले शाहजहाँ को आज उनकी पुण्यतिथि पर नमन।

फेसबुक से टिप्पणी करें