गुरु गोबिन्द सिंह सिक्खों के दसवें व अंतिम गुरु माने जाते हैं। वे 11 नवंबर, 1675 को सिक्खों के गुरु नियुक्त हुए थे और 1708 ई. तक इस पद पर रहे। वे सिक्खों के सैनिक संगति, ख़ालसा के सृजन के लिए प्रसिद्ध थे। कुछ ज्ञानी कहते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है, तब-तब सत्य एवं न्याय का विघटन भी होता है तथा आतंक के कारण अत्याचार, अन्याय, हिंसा और मानवता खतरे में होती है। उस समय दुष्टों का नाश एवं सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा करने के लिए ईश्वर स्वयं इस भूतल पर अवतरित होते हैं। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने भी इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए कहा है,

“जब-जब होत अरिस्ट अपारा। तब-तब देह धरत अवतारा।”

22 दिसंबर 1666 में जन्मे सिक्खों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह को शत शत नमन।

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