सेंसर बोर्ड में फंसी फ़िल्म तर्पण कल 26 अप्रैल को रिलीज़ को है तैयार

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जातिवादी मानसकिता पर बनी इस फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में मिल चुके हैं 28 अवार्ड्स

शहर के मीरा चित्र मंदिर में कल से 2 मई तक इसे सुबह 10 बजे से 12 बजे अपराह्न तक देख सकते हैं

हरदोई में ही पले बढ़े अभिनेता राहुल चौहान की फ़िल्म में है अहम भूमिका, इस साल 3 फिल्में और भी हैं फ्लोर पर

जातिवाद जैसी सामाजिक बुराई की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म तर्पण अपने विषय के चलते सेंसर से लम्बे मतभेद के बाद अब प्रदर्शन के लिए तैयार है।

फ़िल्म में अहम क़िरदार निभा रहे अभिनेता राहुल चौहान ने आज हरदोई में फ़िल्म का ट्रेलर लांच किया साथ ही पत्रकारों को सम्बोधित किया। फ़िल्म “तर्पण” ने दुनिया के कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में अब तक 28 अवार्डस पाए हैं और 26 अप्रैल से सिनेमाघरों में रिलीज़ के लिए तैयार है।

राहुल चौहान ने बताया कि एमिनेंस स्टुडिओज़ प्रस्तुति और मिमेसिस मीडिया के बैनर तले निर्मित फ़िल्म तर्पण वर्तमान समय में समाज के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी का समर्थन करती है साथ ही जातिवाद के सामाजिक समीकरण पर कुठाराघात करती है। समाज में महिलाओं के कई भावनात्मक और सामाजिक पहलूओं को ये फ़िल्म गहराई से दिखाती है। यह फ़िल्म लेख़क शिवमूर्ति की नॉवेल पर आधारित है। और इसकी निर्मात्री व निर्देशक नीलम आर सिंह हैं। उन्होंने बताया कि तर्पण मूलरूप से तॄप्त शब्द से बना है जिसका अर्थ दूसरे को संतुष्ट करना है। तर्पण का शाब्दिक अर्थ देवताओं, ऋषियों और पूर्वजों की आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए जल अर्पित करना है।

ज्ञात हो कि हरदोई में पले बढ़े अभिनेता राहुल चौहान ने उमराव जान फेम मुज़्ज़फ्फर अली की टेली फिल्मो से अभिनय का कैरियर शुरू करके, अब तक शुभ मंगल सावधान, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स, राँझना, शोरगुल, इशकज़ादे जैसी तक़रीबन 9 हिट फ़िल्मो में अभिनय का जौहर दिखाया है। राहुल की इस साल तीन फिल्में आने वाली है जिसमे उनके प्रमुख किरदार हैं।

हरदोई में सिनेमा हॉल ख़ाली नही होने पर फ़िल्म तर्पण सुबह 10 बजे के शो में 26 अप्रैल से 2 मई तक दिखाई जाएगी। फ़िल्म तर्पण की कहानी बेहद ही संवेदनशील विषय से जुडी है। गाँव की छोटी जाति की युवती राजपतिया को एक ऊँची जाति के ब्राह्मण लड़के चन्दर द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। अपने लाभ और स्वार्थ के चलते कुछ लोग इस घटना को एक राजनैतिक मुद्दे का रूप दे देते हैं। और जब गवाहों के अभाव में चन्दर को कोर्ट से ज़मानत मिल जाती है तो एक स्थानीय राजनेता राजपतिया के भाई को समझाता है कि किस तरह से बदला लिया जाना चाहिए।