3 फ़रवरी : आज ही के दिन नहीं रहे थे महान तबला वादक अल्लाह रक्खा खान

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अल्लाह रक्खा ख़ान सुविख्यात तबला वादक, भारत के सर्वश्रेष्ठ एकल और संगीत वादकों में से एक थे। इनका पूरा नाम पूरा नाम क़ुरैशी अल्ला रक्खा ख़ाँ है। वे अपने को पंजाब घराने का मानते थे। उनके पुत्र का नाम ज़ाकिर हुसैन है जो स्वयं प्रसिद्ध तबला वादक हैं।

अल्ला रक्खा ख़ाँ 12 वर्ष की उम्र से ही तबले के सुर और ताल में माहिर थे। वे घर छोड़ कर उस समय के एक बहुत प्रसिद्ध कलाकार उस्ताद क़ादिर बक्श के पास चले गये। जैसे जौहरी हीरे की परख कर लेता है, वैसे ही उस्ताद क़ादिर बक्श भी उनके अंदर छिपे कलाकार को पहचान गये और शिष्य बना लिया। इस प्रकार उनकी तबले की तालीम विधिवत आरंभ हुई। इसी दौरान उन्हें गायकी सीखने का भी अवसर मिला। मियां क़ादिर बक्श के कहने पर उन्हें पटियाला घराने के मशहूर खयाल-गायक आशिक अली ख़ाँ ने रागदारी और आवाज़ लगाने के गुर सिखाये। ऐसा माना जाता था कि बिना गायकी सीखे संगीत की कोई भी शाखा पूर्ण नहीं होती।

पंडित रविशंकर के साथ अल्ला रक्खा ख़ाँ जी का तबला और निखर कर सामने आया। इस श्रंखला में सन् 1967 ई. का मोन्टेनरि पोप फ़ेस्टिवल तथा सन् 1969 ई. का वुडस्टाक फ़ेस्टिवल बहुत लोकप्रिय हुए। इन प्रदर्शनों से उनकी ख्याति और अधिक फैलने लगी। 1960 ई. तक वे सितार सम्राट पंडित रविशंकर के मुख्य संगतकार के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके थे। वास्तव में उनका तबला वादन इतना आकर्षक था कि जिसके साथ भी संगत करते, उसकी कला में भी चार चाँद लग जाते थे। वे कलाकार के मूड और शैली के अनुसार उसकी संगत करते थे। सिर्फ़ एक संगतकार के रूप में ही नहीं, अपितु एक स्वतंत्र तबला वादक के रूप में भी उन्होंने बहुत नाम कमाया। भारत में भी और विदेशों में भी आपने तबले को एक स्वतंत्र वाद्य के रूप में प्रतिष्ठित किया।

संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को स्वीकार करते हुए भारत सरकार द्वारा सन् 1977 ई. में उन्हें पद्मश्री के सम्मान से अलंकृत किया गया।

सन् 1982 ई. में संगीत नाटक अकादमी ने भी उन्हें जीवन पर्यंत संगीत सेवा के लिये अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया।

3 फरवरी, सन् 2000 ई. को मुंबई में हृदय गति के रुक जाने से उनका निधन हो गया। उस से ठीक एक दिन पहले ही उनकी सुपुत्री का निधन हुआ था। लोगों का कहना है कि वे पुत्री के सदमे को सह नहीं पाए। हमारी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।