ह्वेन सांग एक दार्शनिक, घुमक्कड़ और अनुवादक थे। उनका मूल नाम चेन आई था। ह्वेन त्सांग, जिन्हें मानद उपाधि सान-त्सांग से सुशोभित किया गया। उन्हें मू-चा ति-पो भी कहा जाता है। जिन्होंने बौद्ध धर्मग्रंथों का संस्कृत से चीनी अनुवाद किया और चीन में बौद्ध चेतना मत की स्थापना की।

चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने हर्षवर्धन के शासन काल में भारत की यात्रा की थी। उन्होंने अपनी यात्रा 29 वर्ष की अवस्था में 629 ई. में प्रारम्भ की थी। यात्रा के दौरान ताशकन्द, समरकन्द होते हुआ ह्वेन त्सांग 630 ई. में ‘चन्द्र की भूमि‘ (भारत) के गांधार प्रदेश पहुँचे। गांधार पहुंचने के बाद ह्नेनसांग ने कश्मीर, पंजाब, कपिलवस्तु, बनारस, गया एवं कुशीनगर की यात्रा की। कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के निमंत्रण पर वह उनके राज्य में लगभग आठ वर्ष (635-643 ई.) रहे। इसके पश्चात् 643 ई. में उन्होंने स्वदेश जाने के लिए प्रस्थान किया। वह काशागर, यारकन्द, खोतान होते हुआ, 645 ई. में चीन पहुंचे। वह अपने साथ भारत से 150 बुद्ध के अवशेषों के कण, सोने, चांदी, एवं सन्दल द्वारा बनी बुद्ध की मूर्तियाँ और 657 पुस्तकों की पाण्डुलिपियों को ले गए थे।

ह्वेन त्सांग की भारत यात्रा का वृतांत हमें चीनी ग्रंथ ‘सी यू की‘, वाटर्ज की पुस्तक ‘On Yuan Chwang’s Travel In India ‘ एवं ह्मुली की पुस्तक ‘Life of lliven Tsang’ में मिलता है। ह्वेन त्सांग के विवरण से तत्कालीन भारत के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं प्रशासकीय पक्ष पर प्रकाश पड़ता है। ह्वेन त्सांग ब्राह्मण जाति का ‘सर्वाधिक पवित्र एवं सम्मानित जाति‘ के रूप में उल्लेख करते हैं। क्षत्रियों की कर्तव्यपरायणता की प्रशंसा करते हुए उसे ‘राजा की जाति‘ बताते हैं और वैश्यों का वह व्यापारी के रूप में उल्लेख करते हैं। ह्वेन त्सांग के विवरण के अनुसार उस समय मछुआरों, कलाई, जल्लाद, भंगी जैसी जातियां नगर सीमा के बाहर निवास करती थीं। नगर में भवनों, दीवारों का निर्माण ईटों एवं टाइलों से किया जाता था।

ह्वेन त्सांग की मृत्यु 5 फ़रवरी, 664 ई. में हुई थी। हमारी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

फेसबुक से टिप्पणी करें

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here