28 फ़रवरी : आज ही के दिन नहीं रहे थे भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद

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भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद बेहद प्रतिभाशाली और विद्वान् व्यक्ति थे। वे भारत के एकमात्र राष्ट्रपति थे जिन्होंने दो कार्यकालों तक राष्ट्रपति पद पर कार्य किया।

गांधीजी के निकट संबंध के कारण उनके पुराने विचारों में एक क्रान्ति आई और वह सब चीजों को नये दृष्टिकोण से देखने लगे। उन्होंने महात्मा गांधी के मानवीय विकास और समाज सुधार कार्यों में भरसक सहायता की। उन्होंने महसूस किया, “विदेशी ताकतों का हम पर राज करने का मूल कारण हमारी कमज़ोरी और सामाजिक ढांचे में दरारें हैं।” अस्पृश्यता का अभिशाप जो प्राचीन समय से चला आ रहा था भारतीय समाज की एक ऐसी कुरीति थी जिसके द्वारा नीची जातियों को ऐसे दूर रखा जाता था मानों वे कोई छूत की बीमारी हों। उन्हें मंदिर के भीतर जाने नहीं दिया जाता था। यहाँ तक की गांव में कुए से पानी भी नहीं भरने देते थे।

लेकिन समाज के बदलने से पहले अपने को बदलने का साहस होना चाहिये। “यह बात सच थी,” राजेन्द्र प्रसाद ने स्वीकार किया, “मैं ब्राह्मण के अलावा किसी का छुआ भोजन नहीं खाता था। चम्पारन में गांधीजी ने उन्हें अपने पुराने विचारों को छोड़ देने के लिये कहा। आख़िरकार उन्होंने समझाया कि जब वे साथ-साथ एक ध्येय के लेये कार्य करते हैं तो उन सबकी केवल एक जाति होती है अर्थात वे सब साथी कार्यकर्ता हैं।”

राष्ट्रपति बनने पर भी उनका राष्ट्र के प्रति समर्पित जीवन चलता रहा। वृद्ध और नाज़ुक स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने भारत की जनता के साथ अपना निजी सम्पर्क क़ायम रखा। वह वर्ष में से 150 दिन रेलगाड़ी द्वारा यात्रा करते और आमतौर पर छोटे-छोटे स्टेशनों पर रूककर सामान्य लोगों से मिलते।

सन 1962 में अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें “भारत रत्‍न” की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया। यह उस पुत्र के लिये कृतज्ञता का प्रतीक था जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी।

आज ही के दिन 1963 में उनकी मृत्यु हुई थी। हमारी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।