हरदोई : पिहानी ब्लॉक में सत्ता के बाद भी बैठकों से क्यों कन्नी काट रहीं प्रमुख

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बहुमत नहीं होने के बाद भी निर्विरोध प्रमुख निर्वाचित हुई थीं स्वर्णलता सिंह

2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की बहुमत की सरकार गठन के बाद क्षेत्र पंचायतों की सत्ता बदलनी भी शुरू हो गई थी। पिहानी ब्लॉक में भी स्वाभाविक हालात बने थे। तब शराब माफिया पूर्व ब्लॉक प्रमुख जेपी गुप्ता की पत्नी सरिता गुप्ता मौजूदा ब्लॉक प्रमुख थीं। इलाके के कोटरा गांव के मनोज कुमार सिंह ने सरिता की प्रमुख पद से बेदखली को अनुज वधु स्वर्णलता को आगे किया था। हालांकि, इस कवायद में तत्कालीन भाजपा जिलाध्यक्ष श्री कृष्ण शास्त्री और क्षेत्रीय भाजपा विधायक श्याम प्रकाश के बीच अन्तर्विरोध थे।

बहरहाल, मनोज ने अविश्वास प्रस्ताव का ताना-बाना बुन लिया था, लेकिन प्रस्ताव के पक्ष में उनके पास क्षेत्र पंचायत सदस्यों की संख्या पूरी नहीं थी। इस बीच श्याम प्रकाश ने मामले में पार्टी के फैसले के साथ होने की बात कह दी थी। मनोज जब नियत दिन अविश्वास प्रस्ताव डीएम को सौंपने जिला मुख्यालय पहुंचे तो प्रस्ताव पास कराने के लिए जरुरी बीडीसी सदस्य उनके साथ नहीं थे। शास्त्री के कहने पर श्याम प्रकाश ने सदस्य उपलब्ध कराए, तब सरिता के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो सका था। इसके बाद क्षेत्र पंचायत को नया प्रमुख मिलने तक संचालन समिति गठित हुई। समिति की सूरत देख हैरानी से ज्यादा क्षेत्रीय विधायक की ताकत का अहसास हुआ लोगों को। असल में समिति में अविश्वास प्रस्ताव की अगुवा स्वर्णलता की जगह जेपी व सरिता की पुत्री अंजू शामिल थीं। हालांकि बाद में शास्त्री के दखल से अंजू बहार और स्वर्णलता अन्दर हुईं।

उप चुनाव में शास्त्री की मेहर से स्वर्णलता निर्विरोध ब्लॉक प्रमुख चुनी गईं। क्षेत्र की सियासत की नब्ज जानने वालों का कहना था कि आमने-सामने का चुनाव होता तो परिणाम स्वर्णलता के अनुकूल होना मुश्किल हो जाता। खैर, कुछ समय बाद शास्त्री खुद भाजपा संगठन की सत्ता से बेदखल हो गए। बीडीसी सदस्यों का आरोप है कि स्वर्णलता प्रमुख बनने के बाद एक भी बैठक में नहीं आईं और क्षेत्र पंचायत से होने वाले विकास कार्य ठप हैं। मंगलवार को फिर क्षेत्र पंचायत की बैठक थी, लेकिन प्रमुख के नहीं पहुंचने से स्थगित हो गई। सदस्यों ने प्रमुख की गैरहाजिरी का विरोध किया और कोरम पर दस्तखत नहीं किए। जिले के 19 विकास क्षेत्रों में पिहानी अलहदा हैं, जहां की प्रमुख बैठकों में जाने से बचती दिखती हैं। ऐसे में सवाल लाजिम है, आखिर स्वर्णलता को डर किस बात का है ??? क्या मौजूदा भाजपा जिलाध्यक्ष सौरभ मिश्र नीरज की छत्रछाया उन्हें नहीं मिल रही ???

उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत अधिनियम-1961 कहता है…

1) यदि राज्य सरकार की राय में किसी क्षेत्र पंचायत का प्रमुख या कोई उप–प्रमुख इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्यों और कृत्यों का पालन जानबूझ कर नहीं करता, पालन करने से इन्कार करता है, अपने में निहित अधिकारों का दुरूपयोग करता है, अपने कर्तव्यों के पालन में अनाचार का दोषी पाया जाता है, मानसिक या शारीरिक रूप से अपने कर्तव्यों के पालन में असमर्थ हो गया है, तो राज्य सरकार यथास्थिति ऐसे प्रमुख या उप–प्रमुख को स्पष्टीकरण का समुचित अवसर देने, इस मामले में अन्य पक्ष का परामर्श मांगने और यदि उसकी राय/परामर्श मांगने के पत्र के भेजे जाने के दिनांक से तीस दिन के भीतर प्राप्त हो जाए, तो इस राय/परामर्श पर विचार करने के बाद यथास्थिति ऐसे प्रमुख या उप–प्रमुख को आदेश द्वारा पद से हटा सकती है। ऐसा आदेश अन्तिम होगा और उस पर किसी न्यायालय में आपत्ति नहीं की जा सकेगी। प्रतिबन्ध यह है कि जहां ऐसे व्यक्ति द्वारा और ऐसे रूप में जैसा नियत किया जाए, किसी जांच में प्रथम दृष्टया यह पाया जाए कि किसी प्रमुख या उप–प्रमुख ने वित्तीय और अन्य अनियमितताएं की है तो ऐसा प्रमुख या उप–प्रमुख अन्तिम जांच में आरोपों से मुक्त होने और वित्तीय, प्रशासनिक शक्तियों, कृत्यों का प्रयोग और सम्पादन नहीं करेगा। तब उन शक्तियों, कृत्यों का प्रयोग और सम्पादन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त क्षेत्र पंचायत के तीन निर्वाचित सदस्यों की समिति द्वारा किया जायेगा।

2) इस धारा के अधीन पद से हटाया गया प्रमुख या उप–प्रमुख पद से हटाये जाने के दिनांक से तीन वर्ष की अवधि तक प्रमुख या उप–प्रमुख के रूप में पुनः निर्वाचन का पात्र नहीं होगा।