होटल महेंद्र प्लाज़ा के संचालक आशीष गुप्ता से प्रधान संपादक कुलदीप द्विवेदी ने बात की। पेश हैं उसके मुख्य अंश।

अपने बारे में बताइए, आज आप सफ़ल बिज़नेस मैन हैं, कैसे सोच आई  बिज़नेस की?

मैंने आर आर कॉलेज से इंटरमीडिएट किया है। बीएससी करने के बाद नैनीताल के आम्रपाली स्कूल से बीबीए भी किया है। पढ़ाई करता था, लेकिन जॉब के लिए कभी नहीं सोचा क्योंकि फादर करने ही नहीं देते। वो हमेशा यही कहते थे कि 40 या 50 हज़ार रुपये महीने की जॉब करोगे, इससे ज़्यादा तो हमारे मिलों में चोरी हो जाती है। इसलिए कभी जॉब के लिए सोचा ही नहीं, बस डिग्री चाहिए थी वो ले ली। जब मैं नौवीं कक्षा में था तब से फादर ने बिज़नेस में मुझे इन्वॉल्व करना शुरू कर दिया था।

काफ़ी छोटी उम्र से आप आ गए थे बिज़नेस में! मन लगता था आपका?

हमारी एक छोटी सी ज्वैलरी की शॉप थी, मुन्ने मियां चौराहे पर एक कपड़े की शॉप थी, जिसमें टाटा इंडिकॉम का काम था फिर बाद में टाटा स्काई का काम हुआ। सच कहूँ तो मेरा मन फादर के बिज़नेस में नहीं लगता था, चाहे राइस मिल हो, ईंट का भट्टा हो, मिट्टी के तेल का डिपो हो, कंस्ट्रक्शन का काम हो या फिर कॉन्ट्रैक्टर शिप हो। मेरे दिमाग़ में शुरू से ही ख़ुद की पसंद का कार्य करने की धुन थी।

फिर आपने फादर की सोच और अपनी धुन में कैसे एडजस्टमेंट किया?

ग्रेजुएशन करने के बाद 2006 में मैंने टाटा इंडिकॉम का पूरी डिस्ट्रिक्ट का काम हाथ में लिया जो उस समय लॉन्च हुआ था। 2010 में मैंने साथ ही टाटा स्काई का काम भी कर लिया जो आज तक मैँ शिवम कम्युनिकेशन के नाम से कर रहा हूँ। फादर ने हमेशा ट्रेडिशनल बिज़नेस की तरफ मुझे प्रोत्साहित करने का कार्य किया, लेकिन मैं अपनी ही पसन्द के कार्य करना चाहता था। जहां आप आज ‘होटल महेंद्र प्लाज़ा’ देख रहे हैं, कभी इसी जगह पर फादर की योजना ‘बिग बाज़ार’ और ‘विशाल मेगामार्ट’ लाने की थी, और वे चाहते थे कि उन्हें मैं ही देखूँ, लेकिन मैंने शर्त रखी थी कि मैं अपने हिसाब से करूंगा, आप उसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगे। तो उस समय कार्य मेरे मूड पर डिपेंड करता था, नहीं मन हुआ तो मोबाइल, लैपटॉप पर लगा रहता था, मुझे  महंगे मोबाइल्स और बाइक्स का काफी शौक रहा है, अब तो खैर कारों का नया शौक पाल लिया है। कभी ये दिमाग़ में नहीं था कि अपना बिज़नेस भी करूंगा, हमेशा यही दिमाग़ में रहता था कि फादर का बिज़नेस है तो, ऐश तो हो ही रही है।

फादर होते हैं तो अमूमन चिंताएं तो दूर ही रहती हैं। आपके फादर कई सालों पहले नहीं रहे थे, सुना है आप उसके बाद काफी गंभीर हुए, क्या हुआ था?

मेरे जीवन मे एक नया मोड़ आया। 13 अगस्त 2014 को मेरे फादर की डेथ हो गई। उनकी डेथ के बाद मैं काफी गंभीर हो गया था। डेथ से 15 दिन पहले फादर की बहुत ज़्यादा तबियत खराब थी, राइस मिल में ही थे वे उस वक़्त, मदर ने मुझे फ़ोन करके बोला कि चलो फादर की दवाई दिला दो, मैंने कहा मैं नहीं आऊंगा, उनका हमेशा यही रहता है, वे ख़ुद ले लेंगे। मदर ने कहा कि नहीं बहुत ज़्यादा तबियत ख़राब है, गंभीरता समझकर मैं राइस मिल गया, मैंने देखा कि फादर बैठे थे, मदर ने कहा कि उठाओ इनको, मैंने इसे बहुत ही नॉर्मली लेकर कहा कि अरे इसमें उठाना क्या, चले जाएंगे, मैंने देखा कि वे सही से स्लीपर भी नहीं पहन पा रहे थे, मैंने कहा स्लीपर सही से पहनो, क्या नाटक कर रहे हो ये, लेकिन तुरन्त आभास हो गया कि ये अपने सेंस में नहीं हैं। हम लोग उन्हें डॉक्टर मधुकर के पास लेकर गए, उन्होंने सीटी स्कैन लिख दिया। कराने के बाद जब डॉक्टर को रिपोर्ट दिखाई तो डॉक्टर ने कहा कि आप इन्हें लखनऊ दिखाइए। हमने बाला जी भी दिखाया लेकिन डॉक्टर कटियार ने भी यही बात कही। हम लोगों ने तब भी इसे लाइटली लिया लेकिन उनकी हालत का अंदाज़ा कहीं न कहीं अब होने लगा था। उस रात काफी तेज़ आंधी पानी था, अपनी लाइफ में सबसे तेज़ ड्राइविंग करके मैं लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर पहुंचा था। वहां उन्होंने कहा कि ये दिमाग़ की समस्या है, इन्हें सामने न्यूरो सेंटर में दिखाइए। रात का 2 बज रहा था, वहां रात में कोई डॉक्टर भी नहीं था, हम फिर मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर लेकर आ गए। उस समय नितिन अग्रवाल जी स्वास्थ्य मंत्री थे, उन्हें कॉल किया तो उन्होंने ‘सहारा हॉस्पिटल’ लेकर जाने की बात की। हम लोग सहारा पहुंचे। वहां तुरन्त ट्रीटमेंट शुरू हो गया। उन्हें वहां आईसीयू में शिफ़्ट किया गया। करीब 14 दिन वे वहां रहे। वहां वे थोड़ा थोड़ा सही होने लगे। वहां से वे प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिए गए। मैं और मदर साथ थे उनके, उनकी डाइट वही हम लोग देते थे जो हॉस्पिटल वाले बोलते थे। मैंने उन्हें तरबूज़ के टुकड़े और दलिया खिलाई, खिलाने के तुरंत बाद अचानक उन्हें वॉमिटिंग आई और उनकी सांस काफी तेज़ चलने लगी।

ओह! ठीक होने के बाद फिर ऐसी हालत! काफी परेशानी वाले क्षण रहे होंगे?

जी, फिर तुरन्त डॉक्टर को बुलाया, फिर उन्हें आईसीयू में ले लिया गया। सीनियर डॉक्टर दीपक अग्रवाल ने पूछा कि आपने इन्हें क्या खिला दिया, मैंने कहा वही खिलाया जो आपने सजेस्ट किया था। मैं आईसीयू में फादर के साथ था, मदर को बाहर भेज दिया था। डॉक्टर ने कहा कि इनकी स्थिति और ज़्यादा क्रिटिकल हो रही है, अब इन्हें वेंटिलेटर पर लेना होगा। जब मैंने अपने फादर को वेंटिलेटर पर तड़पते हुआ देखा तो मुझे अजीब तरह की फीलिंग आई कि ये एकदम से हो क्या रहा है! जो इंसान 25 मिनट पहले ठीकठाक था, जिसे मैं अपने हाथों से दलिया खिला रहा था, वो आईसीयू फिर वेंटिलेटर पर पहुंच गया! वेंटिलेटर पर ले जाने से पहले उन्होंने मुझसे कंसर्न लिखाया कि कुछ भी होता है तो हॉस्पिटल रिस्पांसिबल नहीं होगा। मैंने कहा ये लिखकर मैं कैसे दे सकता हूँ। तो वे बोले फिर मैं इलाज कैसे करूं? मैंने उन्हें लिखकर दे दिया। वेंटिलेटर पर लेने के बावज़ूद उनसे संभल नहीं पा रही थी स्थिति, अब उन्होंने डॉक्टर्स की पूरी टीम ही बुला ली थी, जिसमें मेल्स भी थे फीमेल्स भी थीं। और मुझे केबिन से बाहर कर दिया। मैं शीशे से देख रहा था, झांक रहा था, ट्रीटमेंट हो रहा था, लास्ट में पुशिंग मशीन आ गई जो तब प्रयोग की जाती है जब लास्ट टाइम होता है। मैंने वो मंजर भी देखा कि उन्हें पुश किया जा रहा है और वे तड़प रहे हैं, उछल रहे हैं, मेरे पसीना आ रहा था, ये सोचकर कि मेरे फादर के साथ ये सब हो क्या रहा है! उस समय केवल और केवल मेरे मुंह से गॉड का नाम निकल रहा था, मैं सोच रहा था कि मुझे कुछ हो जाए लेकिन फादर सही हो जाएं, 5 या 6 मिनट के बाद डॉक्टर्स की टीम बाहर निकलती है, एक लेडी डॉक्टर आती है, पूछती है कि आप क्या इनके बेटे हैं,मेरे हाँ कहने पर वे हमेँ अंदर ले जाती हैं, मैंने फादर को देखा जो शांति से लेटे हैं, और एकटक मुझे ही देखे जा रहे हैं, मुझे डर सा लगा कि मुझे लगातार क्यों देख रहे हैं! मुझसे कहा गया कि आप स्ट्रॉन्ग लग रहे हो, क्या आपको जो बताया जाएगा वो आप सुन पाओगे, मेरे हाँ कहने पर उन्होंने धीरे से बोला ‘ ही इज़ नो मोर’! वो ब्लैक डे तो था ही, ब्लैक मोमेंट भी था मेरे लिए! आप समझिए मेरे सामने ही मेरे फादर ने दम तोड़ा था, जब वो तड़प रहे थे तो बाहर खड़े होने के बावज़ूद भी हमारा उनका आई कॉन्टैक्ट हो रहा था!

समझा जा सकता है, काफी दुःखद क्षण रहे होंगे आपके लिए, आपने उनके इतने बिज़नेस कैसे मैनेज किए?

पता नहीं वो लास्ट टाइम ऐसा क्या फूंक गए कि जो बंदा इतना आलसी था, जिसका किसी काम मे मन नही लगता था, उसके अंदर एनर्जी आ गई। मैं तो यही कहूंगा कि वे गॉड के घर गए तो लेकिन कुछ ऐसा मेरे अंदर फूंक गए कि मेरी दिलचस्पी बिज़नेस में बढ़ गई। उसके बाद मैंने पलटकर नहीं देखा। रात-दिन सुबह-शाम एक करके बस बिज़नेस बढ़ाने पर ही ध्यान दिया। उस समय मुझे कई दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा क्योंकि मेरे फादर का काफी विरोध भी था, सफल व्यवसाई के वैसे भी विरोधी अधिक होते हैं। लोग सक्रिय हो गए, कि उनका बिज़नेस वे टेकओवर कर लें, ये सब बच्चे हैं, ये क्या कर पाएंगे। उस समय कुछ लोगों का शुक्रगुज़ार रहूंगा, जिन्होंने मेरे ऊपर हाथ रखा, और गाढ़े समय मे मेरी सहायता की। उसके बाद मैंने दिन रात एक करके बिज़नेस की तरक्की के लिए ही कार्य किए। उस समय जितने भी कार्य थे, जैसे फादर सभी की चिंता करते थे, मैंने भी की।

होटल महेंद्र प्लाज़ा कैसे बना?

मैने सर्कुलर रोड पर अपनी खाली पड़ी ज़मीन के लिए कोई अलग बिज़नेस सोचना शुरू किया। बिग बाज़ार वालों ने छोटे शहर में आने से मना कर दिया, विशाल मेगामार्ट यहाँ चल नहीं पाएगा, ये सोचकर 2 लाख की सिक्योरिटी देने के बाद भी हाथ पीछे खीच लिए। फिर खयाल आया कि होटल खोला जाए। फिर आर्किटेक्ट हायर किया, 2 साल की मेहनत के बाद हमारा होटल बनकर तैयार हुआ। फादर का ही सपना था कि इस ज़मीन पर कोई कमर्शियल एक्टिविटी हो जिसे पूरा हरदोई सम्मान के साथ देखे। तो वो मैंने होटल खोलकर पूरा किया। मेरे फादर ने शाहजहांपुर रोड पर पैट्रोल पम्प के लिए ज़मीन खरीदी थी, चाहते थे इस पर पैट्रोल पम्प ही खुले, वो सपना पूरा किया।

सुना है आपका एक और ड्रीम प्रोजेक्ट है?

जी हाँ, एक और ड्रीम प्रोजेक्ट है, मेरा छोटा भाई एमबीबीएस डॉक्टर है।उसके और उसकी वाइफ के लिए एक नर्सिंग होम खोलना है। फादर के नाम से एक महेंद्र नगर कॉलोनी है, उसके फ्रंट गेट पर इसे खोलने का प्लान है। मेरी लाइफ का ऐम ही यही है कि एक दिन मैं अपने फादर की ही तरह एक सफ़ल बिज़नेस मैन बनूं , और उनके अधूरे सपनों को उनसे भी दो हाथ आगे जाकर पूरा करूं।

आप अपने फादर के अलावा और किससे इंस्पायर्ड हैं?

मुझे धीरू भाई अम्बानी जी से इंस्पिरेशन मिलती है कि जब उनके बेटे उनका नाम लेकर उनसे आगे जा सकते हैं तो हम लोग क्यों नहीं। मेरे फादर फर्श से अर्श पर पहुंचे थे, बिना पैसों के पैसा बनाया था। उन्हें विरासत में कुछ नहीं मिला था।

शहर को आपने ऐसा होटल दे दिया जो आधुनिक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण है। अन्य होटल भी हैं, उनसे प्रतिद्वंदिता में आप ख़ुद को कहां पाते हैं?

हम ख़ुद को प्रतिद्वंद्वी मानते ही नहीं हैं, हम तो कुछ नया करना चाहते हैं। प्रतिद्वंदिता हम इसलिए चाहते हैं, ताकि सुख सुविधाएं मेन्टेन रह सकें। हम कुछ नया करते रहें। कभी ऐसा नहीं किया कि ये जानने की कोशिश करें कि किसी अन्य होटल में क्या क्या सुविधाएं हैं, हमने अपने यहां बेस्ट देने की कोशिश की। रेस्टॉरेंट में 105 लोग बैठ सकते हैं तो वहीं बैंकेट हॉल में हमने 400 लोगों के बैठने की सुविधा दी। फ़ैमिली लॉन्ज हमने अलग से बनाया जो हरदोई के किसी होटल में नहीं है। बेस्ट मीटिंग हॉल बनाया, कैप्सूल लिफ़्ट दीं जो किसी होटल में नहीं हैं। कभी कॉपी नहीं की बल्कि नया किया हमेशा।

कुछ ऐसे होटल्स हैं जो बड़ा लॉन दे रहे हैं, आपको अपने होटल में क्या ऐसी कोई कमी महसूस होती है?

देखिए,शहर में लॉन की कमी नहीं है। अगर किसी को लॉन चाहिए होगा तो वहां जाएगा न कि मेरे पास आएगा। हाँ, बैंकेट हॉल की सुविधा शहर के किसी होटल में नहीं थी, वो हमने अपने यहां मैक्सिमम कैपेसिटी का बनवाया।

कुछ महीनों पहले एक विवाद आया था सामने, आरोप था कि रिहायशी ज़मीन पर आपने व्यवसायिक इमारत खड़ी कर ली?

ये मामला आवास विकास के कमिश्नर के संज्ञान में है, और वे इस पर एक्शन ले रहे हैं। ये मामला कंपाउंडिंग के लिए जा रहा है।  उसे कंपाउंडिंग करने के लिए हम लोगों ने ज़िलाधिकारी के माध्यम से रिक्वेस्ट दी है। जो भी हमारा सम्मन शुल्क है या कोर्ट/रजिस्ट्री फ़ीस है वो हम लोग देंगे। हमारी मांग है कि इस रोड को बाज़ार स्ट्रीट घोषित कर दें क्योंकि इस रोड पर रामजानकी मंदिर, सीएसएन कॉलेज, गल्ला मंडी, इंडस्ट्रियल एरिया, किसान बाज़ार है,और अब तो रेलवे स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म भी इसी रोड पर ही शिफ़्ट हो रहा है। तो आप ख़ुद बताइए जब ये पूरी रोड ही कमर्शियल है तो रेजिडेंस रोड क्यों घोषित है? और चूंकि अब कई सालों से इस पर कमर्शियल एक्टिविटी हो रही है, जिसका हिस्सा हम भी हैं, तो अब पुरानी ग़लती को क्षमा करके, शुल्क लेकर हमें कंपाउंडिंग दे दी जाए।

शहर के अंदर कुछ वर्षों से सामाजिक सरोकार, जागरूकता अभियान बढ़े हैं। आप ऐसे सामाजिक सरोकारों में ख़ुद को कहां पाते हैं?

हम लोग इस तरह की गतिविधियों में हमेशा आगे रहते हैं। जैसे अभी हरदोई मेला चल रहा है, उसमें होने वाली प्रतियोगिताओं के ऑडिशन के लिए हमने 4 दिनों के लिए अपना हॉल फ़्री ऑफ कॉस्ट दे दिया। इसके अलावा भी हम विभिन्न गतिविधियों में शरीक रहते हैं।

आप यूथ हैं, राजनीतिक संभवानाएं सभी के लिए होती हैं, आप अपनी संभावनाएँ कहाँ पाते हैं?

नहीं, हम ख़ुद को राजनीति में देखते ही नहीं हैं। हम राजनीतिक व्यवस्था को भ्रष्ट व चाटुकारिता भरी ही पाते हैं। मुझे इस राजनीतिक सिस्टम से ही घृणा है।