कॉफ़ी अड्डा : लावारिस लाशों का कन्धा, कलयुग के मुक्तिदाता 

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लावारिस लाशों का कन्धा, कलयुग के मुक्तिदाता मृत्यु अन्तिम सत्य है, लेकिन कुछ ऐसे बदकिस्मत होते हैं, जिनकी मौत के बाद उनका अन्तिम संस्कार करने वाला कोई नहीं होता। किसे चिंता होती है ऐसे लोगों की जिन्हें मौत के बाद चार कंधे भी नहीं मिलते। जीवन की अपनी मर्यादा है, मृत्यु की भी। मृत्यु के बाद शव की भी। दुनिया के सभी धर्मों में अंतिम संस्कार की अवधारणा बताती है कि मृत्यु जीवन का अंतिम पड़ाव है और पूरी गरिमा एवं मर्यादा के साथ इस सच्चाई को स्वीकार किया जाए। लेकिन सैकड़ों लाशें रोज ऐसी मिलती हैं, जिनकी पहचान तक नहीं हो पाती है। मोर्चरी और जहां-तहां पड़ी इन लाशों की बेकद्री हम-आप जब तब पढ़ते रहते हैं।

वर्दी की हनक कहें या मजबूरी, मगर लावारिस शव का दाह संस्कार वर्दी के रौब पर ही हो पाता है। लावारिस के कफन से लेकर दाह संस्कार की प्रक्रिया महज तीन सौ रुपये में ही की जाती है। सुनकर यह अचरज जरूर लग रहा होगा, मगर यह यूपी पुलिस ही है कि महंगाई के इस दौर में इतनी कम रकम में ही यह इंतजाम बड़े सलीके से कर जाती है। पुलिस शव को पोस्टमार्टम हाउस भेजती है और फिर उसे उसका अंतिम संस्कार करना होता है। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पुलिस को महज 300 रुपये ही मिलते हैं और यह रकम थानेदार की संस्तुति के बाद ही पुलिस लाइंस में कागज़ी प्रक्रिया पूरी कराने पर हासिल हो पाती है। अब इस रकम में दाह संस्कार कर पाना तो दूर कफन भी ले पाना संभव नहीं होता। करीब चार साल पहले लावारिस लाशों के दाह संस्कार को लेकर 2800 रुपये दिए जाने की घोषणा हुई थी, मगर आदेश नहीं आ सका। इस कारण पुरानी व्यवस्था ही चल रही है।

हिन्दू रिवाज से दाह संस्कार करने में लकड़ी से लेकर कफन और महापात्र खर्च मिलाकर आठ हजार रुपये आते हैं। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं कि महज तीन सौ रुपए में पुलिस किस तरह लावारिस लाशों का अन्तिम संस्कार कराती होगी। लेकिन हरदोई में पुलिस का काम समाजसेवी/अधिवक्ता राजवर्धन सिंह ‘राजू’ ने आसान कर दिया है। राजवर्धन जनपद में लावारिश लाशों का कन्धा बन गए हैं। कहीं भी लावारिश लाश मिलने की सूचना पर वह उसके कफ़न-दफ़न का इंतज़ाम करते हैं और अन्तिम संस्कार के समय मौजूद रहते हैं। अब तक वह 33 लावारिस लाशों का अन्तिम संस्कार करा चुके हैं।

यही नहीं वह गौ-सेवा और नशा मुक्ति अभियान भी संचालित कर रहे हैं। सुरभि गौ सेवा समिति के संरक्षक राजवर्धन सिंह गौ सेवा रथ का संचालन करते हैं। कहीं से भी किसी गो-वंश के बीमार, घायल या संकट में होने की सूचना मिलने पर गो सेवा रथ चिकित्सक और दवाइयों के साथ मौके पर पहुंच जाता है। सर्दी में खुले में रात गुजारने वालों के लिए सर्दी राहत रथ चलवाया, जिसमे चाय के साथ ज़रूरतमंदों के लिए गर्म कपड़ों की भी व्यवस्था रही। राजवर्धन खुद भी मौके पर पहुंचते हैं। एक मर्तबा नाले में गिरी गाय को निकालने को वह खुद नाले में उतर गए। एक घटना के बाद राजवर्धन ने अपने होटल को शिवपाल सिंह जनकल्याण संस्थान के बैनर तले साईं नशा मुक्ति और मानसिक रोग चिकित्सालय में बदल दिया। समाचार सम्पादक बृजेश ‘कबीर’ से बातचीत में राजवर्धन सिंह ने परिवर्तन की वजह बताई।

लावारिस लाशों का कन्धा बनने का विचार कैसे आया ?

राजवर्धन- एक बार माधौगंज से लौटते हुए छोहे पर एक महिला की लावारिस लाश देखी। लोगों की भीड़ तो लगी थी, लेकिन कोई महिला की पार्थिव देह को सद्गति देने वाला नहीं था। बस, वहीं संकल्प ले लिया कि हरदोई में अब कोई लाश लावारिस नहीं होगी और वह विधि पूर्वक अन्तिम संस्कार कराएंगे।

होटल को नशा मुक्ति चिकित्सालय में बदलने का कारण ?

राजवर्धन- होटल एक व्यक्ति को किराए पर दिया था। लेकिन, एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने मन बदल दिया। हालांकि बाद में घटना कूट रचित साबित हुई, पर मन बना लिया कि अब होटल नहीं रखना है और बिल्डिंग का समाज हित में उपयोग करना है। इसके बाद ही नशा मुक्ति और मानसिक रोग चिकित्सालय शुरू कर दिया।

पहले सक्रिय राजनीति में रह चुके हैं। वर्ष 2002 में सदर विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़े। उसके बाद सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। भविष्य में राजनीति के क्षेत्र में जाने का कोई विचार ?

राजवर्धन- भविष्य में राजनीति के क्षेत्र में जाने का अभी कोई विचार नहीं है। हां, विचार बना आगे तो किसी राष्ट्रीय दल से जुड़ेंगे। इंसान की औसत आयु 60-65 साल होती जा रही है। 40 की आयु पार हो चुकी है। अब 10 साल की उम्र तक काम करने की स्थिति है और इस जीवन को ऐसे काम में लगाना है कि हमें आत्मसंतुष्टि मिले और हमारे बाद भी लोग याद करें।