शुभ्रा तो भाजपा के माननीयों के लिए शुभ नहीं रहीं …पुलकित उम्मीदों पर उतरेंगे खरे …रहेंगी नज़रें

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शुभ्रा सक्सेना, यूपीएससी-2009 बैच की टॉपर, इसी साल की 27 अप्रैल को यहां ज़िला कलेक्टर की पोस्ट पर ज्वॉइन किया था उन्होंने। पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में तेवर दिखाए थे सिस्टम सुधार को लेकर। लेकिन, बाद में जो तेवर दिखाए तो सूबे में सत्तारूढ़ भाजपा के सांसदों और विधायकों की सूरतें घुटनों तक लटकी दिखीं, पूरे 08 महीने तक। भाजपा के ‘माननीयों’ की लगातार शिकायत रही कि डीएम उन्हें और उनके कामों को तवज्जो नहीं देतीं। जन-प्रतिनिधि ही नहीं, डीएम के मातहत भी उनसे हलकान रहे। सीडीओ रहे राधेश्याम का अपमान का घूंट पी लम्बी छुट्टी पर जाना और सवायजपुर एसडीएम रहीं वंदना तिवारी को सरेआम बे-इज़्ज़त किया जाना, दोनों मामले चर्चा में रहे।

शुभ्रा सक्सेना के कार्यकाल को कुछ ही माह बीते थे कि 05 भाजपा विधायकों ने डीएम के तबादले को लेकर #पंचम_तल को चिट्ठी लिख मारी थी। लेकिन, कुछ नहीं हुआ था। बाद में मुख्यमंत्री ने लखनऊ मण्डल के विधायकों, डीएम और एसपी की समीक्षा बैठक बुलाई, पर मजाल जो किसी ‘माननीय’ की ज़ुबान जुम्बिश भी ले पाई हो। बाद के दिनों में जिला मुख्यालय एक कार्यक्रम के सिलसिले में पहुंचे भाजपा के प्रदेश महामन्त्री (संगठन) सुनील बंसल ने डॉ0 सुशील चन्द्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ के नुमाइश चौराहा स्थित आवास पर विधायकों की बैठक ली। एक विधायक ने डीएम की कार्यशैली को लेकर शिकवा किया तो बंसल ने उन्हें डपट दिया। यही नहीं, इसके तुरंत बाद बिना किसी आधिकारिक कार्यक्रम के बंसल शुभ्रा की चाय पीने डीएम कैम्प पहुंच गए। फिर तो डीएम ‘हैवीवेट’ हो उभरीं।

अधीनस्थ भी डीएम के व्यवहार से त्रस्त रहे। एक बैठक में उन्होंने तत्कालीन सीडीओ राधेश्याम को इस क़दर अपमानित किया कि वह लम्बी छुट्टी पर चले गए और बाद में अपना तबादला करवा लिया। सवायजपुर की तत्कालीन एसडीएम वंदना तिवारी ने सपा जिला महासचिव वीरेन्द्र यादव ‘वीरे’ पर एण्टी भू-माफ़िया के तहत मुक़दमा दर्ज कराया था। उन्होंने तहसील क्षेत्र के बरगदापुरवा गांव में अवैध कब्ज़े की भूमि पर बने कॉलेज और मार्केट ज़मींदोज़ करने को 03 जून की तारीख़ तय की थी। लेकिन, इसके बाद तहसील दिवस के दौरान डीएम ने उन्हें ख़ूब खरी-खोटी सुनाई। बाद में उन्हें एक्स्ट्रा मजिस्ट्रेट बतौर ज़िला मुख्यालय से सम्बद्ध कर दिया। मजबूरन वंदना तिवारी तबादला करा पीलीभीत चली गईं।

किस्से और भी तमाम रहे उनके। लेकिन, निकाय चुनाव के जब परिणाम आए तो भाजपा वालों ने हार की वजह शुभ्रा सक्सेना को बताया। ख़ासकर सदर और शाहाबाद में। शाहाबाद में तो उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के नामांकन जुलूस को ऐसा टॉरगेट किया था कि पार्टी के अच्छे अच्छे धुरन्धर बचने को कोना खोजते दिखे थे। भले ही मतदान जागरूकता को उन्होंने अपनी अगुवाई में महिलाओं की मुख्यालय पर स्कूटी रैली निकलवाई। लेकिन, मतदान दिवस पर ऐसी सख़्ती की, लोग घरों से निकलने में सकुचाए। भाजपा वालों का आरोप रहा कि डीएम ने केवल पार्टी के बूथ एजेण्टों को टॉरगेट किया और भाजपा की जीत की सम्भावना वाले पोलिंग स्टेशनों पर सख़्ती की। जबकि, अल्पसंख्यक बहुल पोलिंग स्टेशनों के पर व्यवहार नरम रखा।

हालांकि, शुभ्रा सक्सेना द्वारा तैयार किया गया समन सूचना प्रबंधन ई- सिस्टम (साक्षी) को सरकार ने सराहा और शासन ने इसे स्वीकृति दी। योगी सरकार में परिवहन राज्यमन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) स्वतंत्रदेव सिंह ने ‘शुभ्रा के साक्षी’ को बाकायदे अपनी फेसबुक वॉल पर जगह दी। अब शुभ्रा का ज़िले से विशेष सचिव (ऊर्जा) के पद पर तबादला हो चुका है। ज़ाहिर है, भाजपा के गलियारों के साथ प्रशासनिक अमले में भीतरखाने लड्डू फूट रहे होंगे। मुमकिन है, भीतर-भीतर लड्डू बंट भी गए हों। शासन ने यूपीएससी-2010 के 05वीं रैंकर पुलकित खरे को ज़िले की बागडोर दी है। यानी, पुलकित ना केवल डाइरेक्ट आईएएस हैं, बल्कि टॉपर्स के टॉप-10 क्लब में हैं।

पुलकित बग़ल के ज़िले शाहजहांपुर के मुख्य विकास अधिकारी रह चुके हैं। लेकिन, वह चर्चा में तब आए जब प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र काशी में वाराणसी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष बने। पुलिकत ने अथॉरिटी के अफ़सरों और मुलाज़िमों की सम्पत्ति का ब्यौरा तलब कर विभागीय वेब पोर्टल पर अपलोड कराया। प्राधिकरण की भूमि पर हुए अवैध निर्माण को ढहाया। ज़ाहिर है, पुलकित के तेवर भी ‘खरे’ हैं। ऐसे में वह भाजपा सांसदों और विधायकों की उम्मीदों पर कितना ‘खरे’ उतरेंगे, देखने की बात होगी। फ़िलहाल तो इंतज़ार नए जिला कलेक्टर की आमद का है।