हरदोई : रंगकर्मियों व समाजसेवियों के संघर्ष से बना प्रेक्षागृह ज़िला प्रशासन को हस्तांतरित होने के बाद भी है अव्यवस्था का शिकार

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आज़मगढ़ की संस्था सूत्रधार ने मंचित किया मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित नाटक ‘बूढ़ी काकी’

सधे हुए अभिनय, कसी प्रस्तुति ने मौजूद प्रबुद्ध दर्शकों को भीषण उमस में भी बांधे रखा

सामने आई निर्देशक की टीस, प्रेक्षागृह की अव्यवस्थाओं की तरफ़ कराया ध्यानाकर्षण तो बोले ज़िलाधिकारी, अगली बार सब मिलेगा चाक चौबंद

Kuldeep Dwivedi
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ज़िला प्रशासन के बैनर तले आज़मगढ़ की संस्था ‘सूत्रधार’ द्वारा नाटक ‘बूढ़ी काकी’ का मन्चन स्थानीय रसखान प्रेक्षागृह में किया गया।

मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित नाटक ‘सूत्रधार’ की प्रस्तुति ‘बूढ़ी काकी’ का भावपूर्ण मंचन किया गया। नाटक के मंचन से पूर्व ज़िलाधिकारी पुलकित खरे व नगरपालिका अध्यक्ष सुखसागर मिश्र ‘मधुर’ ने दीप प्रज्ज्वलित किया। मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘बूढ़ी काकी’ को कथावाचन शैली में आंचलिक लोकधुनों व कबीर वाणी के साथ प्रस्तुत किया गया। नाटक में बूढ़ी काकी जिनके पति व बच्चों का देहांत कालांतर में ही हो चुका है। अब वह अपने भतीजे बुद्धिनाथ के आश्रय पर रहती हैं। बुद्धिनाथ की पत्नी रूपा काकी को खाने को नहीं देती है। घर में कोई उनकी खोज-खबर नहीं लेता है, सिवाय लाडली के जो रूपा और बुद्धिनाथ की बेटी है। बुद्धिनाथ के बेटे का तिलक घर में पड़ता है। बहुत बड़ा उत्सव होता है। गांव भर के लोग खाते हैं पर उस दिन भी काकी को कोई भोजन नहीं देता। काकी कलपती रहती हैं। लाड़ली आधी रात को उनके लिए चोरी से कुछ खाने को ले जाती है पर काकी की भूख शांत नहीं होती। काकी लाड़ली के साथ बाहर पड़े जूठे पत्तलों के पास जाती है और जूठन चुन-चुन कर खाती हैं। तभी रूपा वहां आकर उस दृश्य को देखती है उसे बहुत ही ग्लानि होती है। वह काकी से माफी मांगती है और उन्हें खाने को देती है। इस प्रकार नाटक का सुखांत होता है।

राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त नाट्य निर्देशक अभिषेक पंडित के सधे निर्देशन व समकालीन नवीन प्रयोग से यह नाटक आज के परिवेश से बहुत ही सलीके से जुड़ता है। निर्देशकीय कल्पना से मूल कथ्य की रोचक प्रस्तुति संभव हो पाती है। प्रेमचंद की कहानी में मोबाइल फोन का प्रयोग बहुत ही चालाकी से किया गया। लोक व मॉडर्न दोनों शैलियों का फ्यूज़न निर्देशकीय कल्पना का परिणाम रहा, जो मूल कथ्य को और भी रोचक तरीके से प्रस्तुत करने में सफल हुआ। सभी कलाकारों का अभिनय सधा हुआ रहा। मंच पर सधे हुए अभिनय के साथ ममता पण्डित, अलका सिंह, अंगद कश्यप, संदीप कुमार, रितेश रंजन दिखे तो मंच परे प्रकाश परिकल्पना में रंजीत कुमार, संगीत में शशिकांत कुमार, रिदम, महमूद अहमद, इफेक्ट्स में ज्ञानेंद्र यादव, ध्वनि में महेश सूफी का योगदान रहा। नाटक के प्रायोजक नेक्सा के प्रबंधक यश अग्रवाल ने सभी कलाकारों को पारितोषिक भी प्रदान किया, साथ ही ज़िलाधिकारी पुलकित खरे ने कलाकारों को स्मृति चिन्ह प्रदान किए।

आई #अभिषेक की #टीस सामने

राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक अभिषेक पंडित को जब बोलने के लिए बुलाया गया तो उनकी टीस बाहर आ ही गई। उन्होंने प्रेक्षागृह में भीषण गर्मी व उमस के मध्य मंचन का ज़िक्र किया, कहा कि कम से कम हॉल एयरकंडिशंड तो होना ही चाहिए। दुःख जताया कि ऑडिटोरियम में लगी लाइट्स काफी कीमती हैं, बावज़ूद इसके देखरेख के अभाव में उन्होंने काम करना बंद कर दिया है। हालांकि जब ज़िलाधिकारी बोलने आए तो उन्होंने अभिषेक को भरोसा दिलाते हुए कहा कि उनके अगले मंचन के समय प्रेक्षागृह की व्यवस्था दुरुस्त मिलेगी। इसका इंतज़ार अभिषेक के साथ साथ जनपद के रंगकर्मियों को भी रहेगा।

#रंगकर्म और #हरदोई

अगर रंगकर्म की बात की जाए तो 70 के दशक से शुरू हुआ रंगकर्म सन 86 से सांस्कृतिक संस्था प्रतिबिम्ब द्वारा सहेजा जाता रहा है। रंगकर्मी आलोक श्रीवास्तव, अनिल श्रीवास्तव, हरिमोहन श्रीवास्तव, मोहम्मद ख़ालिद, राहुल चौहान, नजीब अहमद, विनय शुक्ला, दीपक गुप्ता, अभिषेक गुप्ता, शैलेन्द्र श्रीवास्तव, विप्लव प्रकाश सिंह इसी मंच से निकले रंगकर्मी हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में हैं, लेकिन रंगकर्म के लिए आज भी सतत प्रयत्नशील रहते हैं। अभ्यन्तर, अंतर्ध्वनि जैसी संस्थाओं ने जनपद के रंगकर्म को हमेशा आगे बढ़ाने में सहायक भूमिका अदा की। जनपद में समय समय पर उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ मिलकर कार्यशालाओं का आयोजन भी होता रहा है। मई-जून 2012 में अंतर्ध्वनि और उत्तरप्रदेश संगीत नाटक अकादमी की नाट्य कार्यशाला अंतिम कार्यशाला थी, जिसमें तत्कालीन जिलाधिकारी ने अप्रतिम सहयोग प्रदान किया था। आज भी नन्ही पौध को रंगकर्म के बारे में बताने, उन्हें प्रोत्साहित करने का कार्य अंतर्ध्वनि ने जारी रखा है। अगर प्रशासन सहयोगात्मक रवैया रखे, व ऐसे आयोजनों का क्रम निरन्तर रखे तो स्थिति और भी बेहतर की जा सकती है।

#प्रेक्षागृह का इतिहास

ज्ञात हो कि वर्ष 1990 के दशक में शहर में प्रेक्षागृह के सपनों को साकार करने को शुरू हुई रंगकर्मियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की मुहिम को इसी दशक में प्रेक्षागृह की नींव रखने से मुक़ाम मिलता नज़र आ गया। उस समय करीब 50 लाख की लागत से निर्माण प्रस्तावित किया गया। उसके बाद करीब 12 वर्षों बाद तक प्रेक्षागृह के भवन का निर्माण कभी लागत बढ़ने से कभी बजट न मिलने से आधा अधूरा पड़ा रहा। प्रदेश के संस्कृति विभाग के तत्वावधान में निर्मित होने वाले इस प्रेक्षागृह का निर्माण पूरा होकर शुभारंभ के लिए रंगकर्मियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने काफी समय तक आवाज़ बुलंद की, पर साल दर साल प्रेक्षागृह आधा अधूरा पड़ा रहा।

वर्ष 10 में जब तत्कालीन डीएम एके सिंह राठौर ने प्रेक्षागृह का निर्माण पूरा कराने को प्रयास किए। उनके प्रयास रंग लाए और वर्ष 11 में लोकार्पण होने के साथ ही शासन ने नामकरण कर ‘रसखान प्रेक्षागृह’ ज़िले को समर्पित कर दिया, पर प्रेक्षागृह पर बदहाली एवं अव्यवस्थाओं का साया सा पड़ा दिखाई देता है, बावज़ूद इसके कि अब इसे ज़िला प्रशासन के हैंडओवर किया जा चुका है। सफ़ाई से लेकर प्रेक्षागृह में लगे इलेक्ट्रानिक एवं इलेेक्ट्रिक उपकरणों से लेकर अन्य चीज़ों को जंग लग रही है। लेकिन ज़िम्मेदारों को इसकी कोई परवाह नहीं है। आम लोगों के लिए बने प्रेक्षागृह का आम लोगों से ही अलगाव होता जा रहा है। साफ़तौर पर इसे लेकर स्पष्ट नीति दिखाई नहीं देती है।

ज़िला प्रशासन के अफसरों के निर्देश पर आवंटित होने वाले प्रेक्षागृह को आदर्श एवं व्यवस्थित बनाने की तस्वीर फिलहाल धुंधली है। पूर्व की बात करें तो पूर्व राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल, पूर्व सदर सांसद अंशुल वर्मा और पूर्व राज्यमंत्री व सदर विधायक नितिन अग्रवाल भी प्रेेक्षागृह को वातानुकूलित कराने का वादा कर चुके हैं, पर तब हस्तांतरण का मसला था, अब तो वो भी नहीं है, तो, ज्वलंत प्रश्न अभी भी सामने है, आख़िर कब बहुरेंगे प्रेक्षागृह के दिन?