हरदोई संसदीय सीट पर एक ही बिरादरी के प्रमुख दलों से उतरे प्रत्याशी गड़बड़ा रहे हैं जातीय समीकरण

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पिछले 8 चुनावों से इस सुरक्षित सीट पर है पासी बिरादरी का कब्जा

जातीय समीकरणों में बुरी तरह उलझे चुनाव में भी एक ही जाति से प्रतिद्वंदी प्रत्याशियों का उतरना अचंभित कर देता है और चुनावी विश्लेषकों को सोचने के लिए मजबूर कर देता है। हरदोई सुरक्षित संसदीय सीट से इस बार बीजेपी, सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस तीनों ने पासी बिरादरी का प्रत्याशी उतार कर न जाने किस जातीय समीकरण को साधने का प्रयास किया है।

हरदोई सुरक्षित संसदीय सीट से चार बार कांग्रेस के टिकट पर जीते किंदरलाल और एक बार जीते मन्नीलाल चमार बिरादरी से थे। इनसे मुकाबले में उतरने वाले परमाई लाल पासी बिरादरी के होते थे। 1989 के चुनाव में परमाई लाल ने इस सीट पर जीत दर्ज कर अगले चुनावों में चमार बिरादरी की जीत के रास्ते ही बंद कर दिये। हालांकि परमाई लाल ने 1977 के चुनाव में भी इस सीट से जीत दर्ज की थी। 1991 से फिर जयप्रकाश, उषा वर्मा, अंशुल वर्मा ने जीत दर्ज कर पासी बिरादरी का इस सीट पर वर्चस्व बनाये रखा और इस चुनाव में तो सभी प्रमुख प्रत्याशी पासी बिरादरी के ही आपस में टकरा रहे हैं।

जातीय आधार पर वोट बैंक का कोई आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं है लेकिन राजनैतिक दलों के पास मौजूद आंकड़ों पर गौर करें तो इस सीट पर अनुसूचित जाति की आबादी करीब 30.79 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.01 फीसदी है। इसके अलावा मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 13 फीसदी के करीब है। सवर्ण मतदाताओं के अलावा पिछड़े वर्ग की बड़ी आबादी इस क्षेत्र में हार जीत तय करने में अहम भूमिका निभाती रही है।

सपा बसपा गठबंधन में चमार बिरादरी का अधिक जुड़ाव बसपा से समझा जाता है। शायद इसी लिए सारी पार्टियां पासी बिरादरी के वोट पर दांव आज़माती हैं। वैसे इस सीट पर पासी बिरादरी का वोट चमार बिरादरी से अधिक है। यह भी एक बड़ा कारण बनता है। एक दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि किंदरलाल और मन्नी लाल की राजनीतिक विरासत संभालने वाला कोई सामने नहीं आया जबकि परमाई लाल की राजनीतिक विरासत उषा वर्मा ने बखूबी संभाली और उन्हें सपा मुखिया का वरद हस्त भी मिला हुआ है।

फ़िलहाल यह साफ़ नज़र आ रहा है कि इस बार भी इस सीट पर पासी बिरादरी का कब्जा बरक़रार रहेगा।