‘नेकी की दीवार’ की पहल पर कभी भय का पर्याय रही ‘इमली रोड’ फ़िर होगी आबाद

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अग्रणी संस्था ‘नेकी की दीवार’ की स्वाधीनता दिवस पर ‘नेक पहल’

रोपित होंगे 221 पौधे, लक्ष्य है ‘इमली रोड’ को पुराना स्वरूप देने का

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब एक तरफ़ सामाजिक संस्था ‘नेकी की दीवार’ सर्कुलर रोड पर इमली के पौधों को रोपित कर रही होगी तो इसे नज़दीक से जानने वालों के ज़हन में ‘इमली रोड’ कौंध रही होगी। जी हां, वही इमली रोड जिस पर कभी रेलवे गंज से लखनऊ चुंगी तक का सफ़र एवरेस्ट फ़तह जैसा होता था, वही इमली रोड, जिस पर दोपहर में भी ऐसा सन्नाटा पसरा होता था मानो हम किसी निर्जन जगह हों, वही इमली रोड जिसके तमाम क़िस्से कहानी उस समय के लोगों के ज़हन में हैं। इसे समझने के लिए हमें 80-90 के दशक या उससे भी पहले इसकी सुध रख रहे उन लोगों से मुख़ातिब होना होगा जो कभी हिस्सा रहे हों इसका।
बैंकिंग से जुड़े कर्मचारियों के हितों की आवाज़ बुलंद करने वाले राकेश पांडेय जो अब रिटायर हो चुके हैं, इमली रोड से जुड़ा सवाल पूछने पर यादों में कहीं खो से जाते हैं, बताते हैं कि जहाँ तक उन्हें याद है शुरू में दो सीमेंटेड पट्टियों वाली सड़क थी इमली रोड, जो मुख्यतः लक्ष्मी शुगर मिल तक गन्ना ले जाने वाले वाहनों के इस्तेमाल में आती थी। शहर का आवागमन इस पर बहुत कम था। उनकी याददाश्त में बहुत कम बार इस पर गुजरने का मौका उन्हें मिला। सड़क पर आमतौर पर पूरी तरह सन्नाटा पसरा रहता था। कहते हैं, इस रोड पर जबसे नवीन गल्ला मंडी, इंडस्ट्रियल एरिया और आवास विकास कालोनी बनी तब से आवागमन बढ़ा। धीरे धीरे इमली के पेड़ गायब होते गए और आज यह सरकुलर रोड के नाम से जानी जाती है। एक और बात जो इससे जुड़ी है वो ये कि इसका एक नाम ‘संजय गांधी मार्ग’ भी रखा गया था पर वह ज़ुबान पर चढ़ न सका था। राकेश जी से मिलकर 60 से 70 के दशक या उससे भी पहले की ‘इमली रोड’ का परिदृश्य सामने आया था, इसके बाद 80 से 90 के दशक की ‘इमली रोड’ समझने के लिए हम सोशलाइट दानिश किरमानी से मिले। वे बताते हैं कि जब सन 1986-87 में गंगा देवी इंटर कॉलेज में कक्षा 6 में एडमिशन कराया गया था, उस वक़्त ये कॉलेज हरदोई जनपद के उत्कृष्ट कॉलेजेज़ में शुमार होता था। प्रधानाचार्य स्व. राधाकांत सक्सेना जी से थर्राते थे स्टूडेंट्स, उस समय ‘इमली रोड’ से ही साइकिल से आना जाना होता था। घर वालों के सख़्त निर्देश थे कि इमली रोड पर सन्नाटा रहता है तो स्टेशन की तरफ से आया जाया करो, लेकिन बालक मन कहाँ मानने वाला था, इमली तोड़ने के इरादे से साइकिल खड़ी करके पत्थर चलाना शुरू हो जाता था, साथ ही नज़र भी रहती थी कि कोई अध्यापक न देख ले! क्योंकि उस वक़्त के अधिकांश अध्यापक साइकिल से ही चलते थे और रास्ते मे भी छात्रों की कुटाई कर देने की विशेष परमिशन उन्हें रहती ही रहती थी। उस दौर को याद करते हुए आज भी उनके चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है कि कैसे वे इमली तोड़ते हुए, दोस्तों के साथ हल्ला गुल्ला करते हुए इमली रोड से सफ़र तय करते हुए घर आते थे।
ऐसे ही बहुतेरे क़िस्से इमली रोड से जुड़े हुए रहे हैं। कई लोगों की नज़र में ‘इमली रोड’ भुतही रोड भी रही है जिससे दोपहर में भी निकलने पर एक अनजाना सा भय रहता था और उस दौर में लोग ‘हनुमान चालीसा’ मन में पढ़ते हुए किसी तरह सफ़र तय कर ही लेते थे। 90 के दशक में जब इससे सटी आवास विकास कालोनी प्रकाश में आई तो वीरानी सड़क पर थोड़ी सी रौनक आई, बाद में इसी रोड पर होटल, गल्ला मंडी निर्मित हुई। आज देखा जाए तो उस समय की वीरानी ‘इमली रोड’ आज आबाद है, कई जाने माने होटल, प्रतिष्ठान, सुप्रसिद्ध राम मंदिर इस रोड की शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन इसकी यादों से जुड़े लोगों को वो वाली ‘इमली रोड’ आज भी बहुत याद आती है जिस पर इमली के घने विशालकाय वृक्ष थे, जिसके क़िस्से ज़ुबानों पर थे, जो एक किवदंती सी आज हमारे सामने है।
ऐसे में आज नई पीढ़ी को उसी स्वरूप के दर्शन कराने के लिए अग्रणी सामाजिक संस्था ‘नेकी की दीवार’ ने कमर कसी है। ये वही नेकी की दीवार है जो ज़रूरतमंदों को वस्त्र वितरण के संकल्प के साथ शुरू हुई थी। इसके संयोजक सचिन मिश्रा बताते हैं कि बुधवार को स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर शहर की इमली रोड को फिर पुराना हरा भरा स्वरूप देने के लिए बिलग्राम चुंगी के नज़दीक स्थित ‘वैभव लॉन’ से कभी भय का पर्याय रही ‘बेलाताली’ तक लगभग 221 पौधे रोपित करने का लक्ष्य है जिसमे पीपल, बरगद, इमली, पकरिया, नीम आदि के पौधे रोपित किये जायेंगे। पौधारोपण के साथ ही उनकी सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड्स के साथ ही पौधे लगाने वाले व्यक्ति के नाम की पट्टी भी लगाई जाएगी तथा समय समय पर इनकी देखभाल भी सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने बताया कि अपराह्न 12 बजे होने वाले पौधारोपण में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ साथ जनपद के गणमान्य लोग भी उपस्थित रहेंगे।