अम्मार ज़ैदी
हिंदिओं में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग (तलवार) हिन्दुस्तान की!!
जोशो-खरोश में गाते-गुनगुनाते न जाने क्यों इस बार बहादुर शाह ज़फर रोक नहीं पाए अपनी रूह को लाल किले का रुख़ करने से।  
कितना है बदनसीब “ज़फर” दफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू ए यार में।
रंगून में दफन होने के ग़म से छलछलाई आंखों से अभी लाल किले को निहारते हुए ये शेर पढ़ा ही था कि राहत इंदौरी की अवाज गूंजने लगती है 
अभी गनीमत है सब्र मेरा, अभी लबालब भरा नहीं हूं,
वो मुझको मुर्दा समझ रहा है, उसे कहो मैं मरा नहीं हूं।
बहादुर शाह ज़फर हैरान परेशान से आवाज़ का पीछा करने की कोशिश करते हैं
वो कह रहा है कि कुछ दिनों में मिटा के रख दूंगा नस्ल तेरी,
है उसकी आदत डरा रहा है, है मेरी फितरत डरा नहीं हूं।
कौन हैं जनाब आप?  सामने क्यों नहीं आते?  मेरी सर-ज़मीने-हिंदोस्तान को क्या फिर कोई ललकार रहा है? बुर्जुग ज़फर बदहवास से आवाज को पकड़ने की कोशिश में दौड़ने लगते हैं। गिर ही जाते अगर साहबज़ादे मिर्ज़ा मुगल आकर थाम न लेते। अब्बा हुजूर संभालें अपने आप को। आहा! बेटे मिर्ज़ा मुगल तुम हो। तुम्हारा भाई मिर्ज़ा खि़ज़्र सुल्तान और दादा जान के लाडले मिर्ज़ा अबु बकर कहां हैं?  वो भी यहीं हैं अब्बा जान। आप तशरीफ रखें फिर बात होती है। ज़फर बैठे ही थे कि इमरान प्रतापगढ़ी की आवाज़ महराबों से टकराने लगी –
ये किसने कह दिया तुमसे इनका बम से रिश्ता है,
बहुत हैं जख्म सीने में, फकत मरहम से रिश्ता है।
आखि़र ये माजरा क्या है! कोई समझाएगा मुझे। ज़फर झुंझलाते हुए बोले। हमारा हिंदोस्तां अब आज़ाद हो गया है ज़ालिम अंग्रेज कब के चले गए यहां से। तभी तो जश्न मनाने आए हैं हम। फिर ये रोना-धोना कैसा?  कौन हैं ये…अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे बहादुर शाह ज़फर और दिल खैराबादी का एलान गूंजने लगा – 
यहीं पर देके अपनी जान, जो होगा देखा जाएगा,
नहीं जाएंगे पाकिस्तान, जो होगा देखा जाएगा।
ये किसकी आवाजें हैं?  ये पाकिस्तान क्या बला है भई! कोई बताएगा हमें। मिर्ज़ा खिज्ऱ सुल्तान कुछ कहते क्यों नहीं? मिर्ज़ा मुगल आखि़र बात क्या है?
अब्बा जान कुछ नहीं वो बस… ज़फर झल्ला कर बोले मिर्ज़ा बताओ भी। ये आज के हिंदोस्तान के शायर हैं। जो अपने को देशद्रोही मुसलमान साबित किए जाने के इल्ज़ाम का जवाब दे रहे हैं। अभी यहां देश के हिंदू प्रधानमंत्री का भाषण होने वाला है सो उन्हें ही सुनाने के लिए ये आवाजें भेजी गई हैं। मिर्जा मुगल को आखि़र बताना ही पड़ा। हैरान ज़फर कुछ कह पाते इससे पहले ही अबु बकर बोल पड़ा। 
दादा जानी मैं आपसे नाराज़ हूं। आपने मुझसे झूठ क्यों बोला था?
ज़फर ने पोते अबु बकर को नज़दीक किया और प्यार से पूछा – “हमारे लख़्ते-जिगर क्या झूठ बोला हमने आपसे ज़रा हम भी तो सुनें।“ अबु ने दादा को झटकते हुए दूर होकर गुस्से में कहा – ‘‘आपने कहा था कि हिंदोस्तान हमारा मादर-ए-वतन है। हम हिंदियों की सर ज़मीन पर विदेशी फिरंगियों ने कब्ज़ा किया हुआ है।’’ हां, तो इसमें ग़लत क्या है!  ज़फर ने हैरान होते हुए पूछा। दादाजान वो फिरंगी अंग्रेज हिंद के दुश्मन नहीं हैं।
तो फिर कौन हैं,  ज़फर ने मुस्कराते हुए पूछा। हम हैं दादाजान।
ये मुल्क हमारा कुछ नहीं होता। वो जो पाकिस्तान का नाम आपने सुना,  कहते हैं हमें वहां चले जाना चाहिये। 
जफ़र ने बेचैन निगाहों से बेटों की तरफ देखा। दिन-रात जो यहां सुनता-देखता है अब्बाजान वही बयान कर रहा है। मिर्ज़ा खिज्ऱ सुल्तान ने अफसोस भरे लहजे में कहा।
दिल्ली के इस खूनी दरवाज़े पर किसी को अब हमारे लहू की बूंदें दिखाई नहीं देतीं। कोई नहीं जानता यहां कि 1857 में इसी हिंदोस्तां को आज़ाद कराने की एवज में दिल्ली के इसी खूनी दरवाज़े पर  हमें गोलियों से भून दिया गया था और आपके सामने खाने की जगह हमारे कटे सिर परोसे गए थे। इसी लाल किले में आप पर देशभक्ति का जुल्म साबित हुआ था। आप यहां की दो गज़ ज़मीन के लिए तरसते रहे। आज यहां हम खूंखार हमलावरों के सिवा कुछ भी नहीं। दिनों-दिन यहां कि आवाम को हमसे नफरत करना सिखाया जा रहा है।
कहीं से किसी ने ज़फ़र से बोला, आप यहां कहां चले आए ज़फर बाबा। ये वो हिंदोस्तान नहीं है जहां आपको सब हिंदोस्तान का धर्मनिरपेक्ष, ईमानदार सरपरस्त मानते थे। 1857 में सभी सैनिकों ने और झासी की रानी लक्ष्मीबाई समेत सभी हिंदू-मुसलमान राजे-रजवाड़ों ने आपको अपना शासक घोषित कर अंग्रजों को बताया था कि हिंदोस्तान पर हिंदुस्तानियों का राज रहेगा, विदेशियों का नहीं। तब आप हिंदुस्तानी थे।
अफसोस ज़फर बाबा ये 1857 नहीं 2018 है। आज आप खुद विदेशी करार दे दिए गए हैं। आपके जैसा धर्मनिरपेक्ष ज्ञानी जो भी इस षड़यंत्र को समझकर विरोध करता है वो पत्थरों-गोलियों से मार गिराया जाता है। 
आप यहां कहां आ गए बाबा, जाईये रंगून ही आपके लिए भला है। हमारी नस्लों और इस लाल किले को अभी और बहुत कुछ देखना-भुगतना है। किसी की भी तरफ देखे बगैर बदहवास ज़फर भीगी आवाज़ में खुद को समेटते-सुनाते, कहते चले जा रहे हैं –

बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,
किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में।

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