साहित्य जगत में शोक की लहर

अंतर्ध्वनि डेस्क
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हिंदी की मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती का निधन हो गया है। दिल्ली में 94 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली। सीने में दर्द की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कृष्णा सोबती के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है।

‘मरजानी’ के बाद सोबती पर पाठक फ़िदा हो उठे थे। ये इसलिए नहीं हुआ कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा पर निकल पड़ी थीं। ऐसा हुआ क्योंकि उनकी महिलाएं समाज में तो थीं, लेकिन उनका ज़िक्र करने से लोग डरते थे।

साल 2017 में भारतीय भाषाओं के साहित्य में योगदान के लिए दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार वयोवृद्ध कथाकार कृष्णा सोबती को मिला था। वे इस सम्मान की वास्तविक हकदार थीं।

कई साहित्यिक पुरस्कारों से नवाजी जा चुकी कृष्णा सोबती को हिंदी कथा साहित्य की मजबूत स्वर रही हैं वे हमेशा अपने कथा शिल्प में नए-नए चरित्रों को गढ़ने में उस्ताद कारीगर रही हैं।

उनके हर उपन्यास या कहानी का चरित्र अपने पिछले चरित्र से आगे निकल जाता है। जिन्होंने उनके उपन्यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ को पढ़ा है वे जानते हैं कि ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ और ‘ऐ लड़की’ की लड़कियों के चरित्र किस प्रकार से एक दूसरे से जुदा हैं।

कृष्णा सोबती के उपन्यास काफी चर्चा में रहे हैं। अपनी आंतरिक बुनावट और संदेश के लिए ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ (1972 ) और ज़िंदगीनामा (1979) हिंदी कथा साहित्य में मील का पत्थर माने जा सकते हैं।

‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में अलगाव से जूझती एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने अपने जीवन के उत्तरार्ध में वह चुना जिसे उसे बहुत पहले चुन लेना चाहिए। ज़िंदगीनामा का वितान बड़ा है जिसमें पंजाब के समाज का रोजमर्रापन और उसके बीच अपने लिए गुंजाइशें निकालते इंसानों की टूटी-बिखरी गाथाएं हैं।

यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था।