वीर सपूत

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सुनो इस राजनीती को , सीमा से हटा लो तुम
शहादत वीर की होती , जरा इसको बचा लो तुम ।

क्या होता दर्द है सीने में उन माताओँ बहनों के
कि जिनके वीर पूतों पर चलाते राजनीती तुम ।

शहादत से बड़ा न दूसरा कोई कर्म होता है
कहाते वीर हैं केवल न कोई धर्म होता है 

कहीं सीमा पे जब कोई , सिपाही वीर जगता है,
उसी के साए में देखो हमारा देश सोता है ।

न हिन्दू , न मुसलमाँ , सिख , न ईसाई होता है ,
वतन पर जो निछावर हो वो अपना भाई होता है ,

वतन के वास्ते जीना , वतन पर जाँ लुटा देना
ये सैनिक इस जहाँ में प्रभु की ही परछाई होता है ।

बहन बाँधे कलाई पर वो बस धागा नहीं होता
अगर सो जाते सैनिक , देश भी जागा नहीं होता

पराक्रम उस कलाई का है देखा आज दुश्मन ने ,
नहीं तो मुँह छुपाकर आज वो भागा नही होता ।

खुली अब छूट सेना को , मिटा दो नाम दुश्मन का
कि अब बुझने नहीं देंगे , दिया भारत के आँगन का ,

अरे अब भूल जाओ तुम फैलाना दहशतगर्दी को
मिटा के रख देंगे नामोँ निशाँ , कि तेरी सात पुश्तों का

मेरे प्रधानसेवक ने हमें बढ़ना सिखाया है
सदा थे वीर हम पर अब हमें लड़ना सिखाया है

जो दुश्मन आज तक चढ़ता चला आता था सीने पर
उसी दुश्मन की छाती पर हमें चढ़ना सिखाया है ।।

रूपेश दीक्षित ( ज्ञानू )