साँझी विरासत हमारी सांस्कृतिक धरोहर….

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मैं चिराग से जला चिराग हूँ,
रौशनी है पेशा खानदान का।

अम्मार ज़ैदी

मुझे फख्र है कि मैं हिन्दू मुसलमान यकजहती की उस सरजमींन से ताल्लुक़ रखता हूँ जिसकी फिज़ाओ में इस एकता के अलंबरदार सैय्यद इब्राहिम रसखान की कृष्ण भक्ति महक रही है कि जिसके लिये भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था, “इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए”। और अगर शजरे का मुताल्या किया जाए तो शायद उनका और हमारा डीएनए भी एक ही होगा।
आज पूरी दुनिया जो हैरत और रश्क़ से हमारी साँझी विरासत को देखती है, और शायद यही हमारी पहचान बन चुकी इसी एकता का ही नाम हिंदुस्तान है, कि एक मुसलमान लेखक डॉ. राही मासूम रज़ा ने महाभारत की स्क्रिप्ट लिखी, और फिर ऐसे लिखी की लोग उनको आधुनिक महाभारत का व्यास कहने लगे।
मुझे फ़ख़्र है कि राही का राष्ट्रवाद माँ की ममता के साथ और रसखान का एकतावाद बाप की शफ़क़त के साथ विरासत में मिला है, राही और रसखान का वारिस और पैरोकार होना फ़ख़्र के साथ साथ ज़िम्मेदारी भी है।
धार्मिक सहिष्णुता का नारा उठाने वालों में अमीर खुसरो का नाम अग्रणी है। यह बात उनके एक ही शेर से स्पष्ट की जा सकती है……
मा ब इश्क-ए यार अगर दर किब्ला गर दर बुतकदा,
अशिकान-ए-दोस्त रा अज कुफ्र ओ इमान कार नीस्त।
हमारे साहित्यिक पूर्वज अमीर खुसरो को फ़रामोश करके क्या हम हिंदी साहित्य की कल्पना कर सकते है ?
साझा संस्कृति’ का प्रमुख तत्व है हिंदू-मुस्लिम यकजहती तथा संस्कृति में हिंदू-मुस्लिम संस्कृतियों का एक-दूसरे में घुल-मिल जाना और इसी आत्मसातीकरण की दुहरी प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति की आत्मा का निर्माण हुआ है। साझा संस्कृति की अवधारणा का यह केंद्रीय बिंदु है। साझा संस्कृति का मतलब हिंदू-मुस्लिम यकजहती भर नहीं है बल्कि इसे एक बड़े दायरे में देखा जाना चाहिए। इस साँझी संस्कृति को खत्म करने का मतलब है भारतीय तहज़ीब की रूह को क़त्ल कर देना। हिंदुस्तानी तहज़ीब में से मुस्लिम अवदान या इस्लाम के अवदान को निकाल देने का मतलब है देश को सांस्कृतिक रूप से खत्म कर देना।
साझा संस्कृति के खंडित हो जाने की जो लोग बात करते हैं, वे संस्कृति को बहुत सीमित अर्थों में ग्रहण करते हैं, जबकि साझा संस्कृति हमारी सांस्कृतिक आत्मा में समा चुकी है। उसे आसानी से खत्म करना बेहद मुश्किल है। क्या हम साझा संस्कृति में से उन तत्वों को निकाल सकते हैं जिनके निर्माण में मुसलमानों एवं इस्लाम धर्म की निर्णायक एवं आविष्कारक की भूमिका रही है। उन आविष्कारों को देश की विरासत से निकालने का मतलब होगा, बर्बरता के युग में लौटना। साझा संस्कृति के अनेक महत्वपूर्ण तत्व आज भी जिंदा हैं और जब तक सभ्यता रहेगी तब तक जिंदा रहेंगे। ये तत्व साझा संस्कृति की धुरी हैं।