हुमायूं के दरबार मे चीफ़ जस्टिस रहे सदर जहाँ ने ही बसाई थी पिहानी

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उर्स का मेला आज पिहानी में धूमधाम से मन रहा है, हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक है मेला

पिहानी को वजूद देने वाले बाबा सदर जहां का उर्स आज बड़ी ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। उर्स पर रौजा मैदान में लगे मेले में क्या बच्चे, क्या बड़े सभी जमकर मस्ती कर रहे हैं। इस मौके पर बाबा सदर जहां और उनके भाई बदर जहां की कब्रों पर चादरें चढ़ाने और मन्नतें मानने का सिलसिला भी रात होने तक जारी रहता है। आज ये ख़ास तस्वीरे जो आप कोलाज में देख पा रहे हैं, शुएब ज़फर ने उपलब्ध कराई हैं।

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, सन् 1540 ईस्वी में हुमायूं और शेर शाह सूरी के बीच हुई जंग में हुमायूं की हार के बाद लश्कर इधर उधर बिखर गया। नवाब सदर जहां इसी जगह (पिहानी) में आकर छिपे थे, जहां पहले जंगल ही जंगल था। नवाब सदर जहाँ हुमायूं के दरबार मे काज़ी उल कुज़्ज़ाह (चीफ़ जस्टिस) थे। अगर आज उनके परिवार की बात की जाए तो स्वर्गीय बब्बे मियाँ के परिवार के नवाब अरशद ज़ैदी, क्रिकेट में अंतरराष्ट्रीय नाम कमा चुके अली हामिद ज़ैदी व अम्मार ज़ैदी उन्ही के ख़ानदान के हैं।

हुमायूं के दोबारा तख़्त पर बैठने के बाद यह ज़मीन नवाब सदर जहां को जागीर मेें मिली तो उन्होंने इस स्थान पर नगर आबाद किया और पिन्हानी (छिपने की जगह) नाम रखा, जो अब पिहानी के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि जंगलों को काटकर ख़ूबसूरत पिहानी बसाने का श्रेय उन्ही को है। उनके ना रहने के बाद उनके बेटे नवाब निज़ाम मुर्तज़ा ने छोटी पिहानी और बड़ी पिहानी के बीच उनके रौजेे का निर्माण कराया।

इसी जगह हर साल ज्येष्ठ माह के पहले रविवार को मेला और उर्स उनके ज़माने से होता आ रहा है। इस बार रमज़ान पड़ जाने के कारण इसे पहले रविवार को ना करके आज तीसरे रविवार को आयोजित किया जा रहा है। बाबा के उर्स और मेले में बच्चे खाने-खिलौनों की दुकान और झूलों पर जमकर लुत्फ उठाते हैं। मेले में आर्टिफिशियल ज्वैलरी से लेकर खाने पीने की चीजें, झूले वगैरह सभी को आकर्षित करते हैं। इस मेले का एक नाम ‘तरबूज़ वाला मेला’ भी रहा है। बताया जाता है कि यहां बेहतरीन से बेहतरीन तरबूज़ बिक्री के लिए आते थे। अकीदतमंदों की कतारें पूरा दिन रौजे पर लगीं रहती हैं। महिला-पुरुष अकीदतमंद कब्र पर हाज़िरी देकर चादर चढ़ाते हैं, चिराग़ जलाते हैं और मन्नते मानते हैं। यह सिलसिला रात होने तक जारी रहता है। हिंदू-मुसलिम एकता के प्रतीक इस प्राचीन उर्स और मेले मेें मुसलिमों के साथ ही अन्य धर्मों के अकीदतमंद भी चढ़ावा चढ़ाकर बाबा सदर जहां से अपनी अकीदत का इजहार करते हैं।

रौजा ए सदर जहां की मजार के पीछे काफी बड़ा नवाब तालाब है। हाल ही में इसके सौंदर्यीकरण के लिए पौने 2 करोड़ रुपया शासन से मंज़ूर हुआ है। इसकी 30 लाख की पहली क़िस्त आ तो गई है लेकिन ज़िला कोषागार में है। ये पैसा पिहानी नगरपालिका को मिलते ही इसके सौंदर्यीकरण पर काम शुरू हो जाएगा।