स्वच्छता योजना में भी भ्रष्टाचार की गन्दगी

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शौचालय निर्माण का अनुदान नहीं, दे रहे सामग्री
“दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पर रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिंजरा उन के पिंजरे में सुआ।”
सरकार का चेहरा कोई भी हो, लेकिन व्यवस्था का सच अग्निधर्मा कवि दुष्यन्त कुमार की इन दो लाइनों में समाया रहता है। तमाम सरकारी योजनाओं के साथ स्वच्छ भारत अभियान की दिशा में शौचालय निर्माण योजना ऐसी है, जिसमे अनुदान सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में पहुंचाने की व्यवस्था है। लेकिन, क्या ऐसा हो रहा है ??? सवाल का जवाब ना तो हैरान करता है, ना ही निराश। हां, नाउम्मीदी ज़रूर होती है वर्तमान संग भविष्य को लेकर।
मई 2017 में मोदी सरकार ने नई नीति के तहत सरकारी शौचालय निर्माण के लिए अनुदान सीधे लाभार्थी के खाते में देने का निर्णय किया था। इस योजना के लिए दिए जाने वाले कुल अनुदान ₹12,000 में 75 फ़ीसदी यानी ₹9,000 हजार केन्द्र सरकार और ₹3,000 प्रदेश सरकार देती है, जिसका क्रियान्वयन ग्राम पंचायतों के हाथ है। योजना के तहत अनुदान की पहली क़िस्त ₹6,000 प्रोत्साहन राशि के रूप में लाभार्थी को दी जाती है। शेष राशि शौचालय निर्मित हो जाने और उसका उपयोग शुरू होने पर दिए जाने का प्रावधान है।
लेकिन, क्या ऐसा ही हो रहा है ??? जवाब के लिए ले चलते हैं कटियारी के गांव चाऊंपुर। गांव के घनश्याम, आदेश, हजरुद्दीन, राकेश, विजेन्द्र सिंह, साबिर और हसीना आदि शौचालय योजना के लाभार्थी हैं। इनका कहना है कि अनुदान की जगह इन सभी को निर्माण सामग्री दी जा रही है, वह भी पर्याप्त नहीं। इन लाभार्थियों का कहना है कि अव्वल की जगह दोम व पीला ईंट दी गईं हैं। सीमेन्ट पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलने से बालू का प्रयोग अधिक मात्रा में करना पड़ रहा है। नतीजतन एक शौचालय का दरवाजा ऊपर से उखड़ गया है। शौचालय पर स्लैब डालने की जगह पतले टायल-नुमा पत्थर रखे गए हैं।
चाऊंपुर के शौचालय लाभार्थियों की ज़ुबानी तो यही लग रहा कि सरकार के तमाम दावों के विपरीत अनुदान का लाभ सीधा लाभार्थी को दिए जाने और निर्माण की गुणवत्ता पर ग्राम प्रधान कुण्डली मारे बैठे हैं। तिस पर विद्रूप यह कि चाऊंपुर की प्रधानी सत्तारूढ़ भाजपा के एक जिम्मेदार ओहदेदार की छत्रछाया में है। वो भाजपा, जिसकी केन्द्र सरकार के प्रधान नरेन्द्र मोदी ताल ठोंक कहते हैं, ना खाऊंगा-ना खाने दूंगा। फ़िलहाल, शासन ने गांवों को खुले में शौच से मुक्त करने को 30 नवम्बर की डेडलाइन तय की है और प्रशासन का पूरा जोर जैसे-तैसे शौचालय निर्माण का लक्ष्य पूरा करने पर है। ऐसे में ज़ाहिर है, ज़िम्मेदारों को यह देखने की फ़ुरसत नहीं कि अनुदान लाभार्थियों को मिल रहा या प्रधान की जेब का वजन बढ़ा रहा।
जनता एक विश्वास, एक भरोसे, एक उम्मीद से पंचायत से संसद तक के नुमाइन्दे चुनती है। लेकिन, अन्त में उसके हिस्से आती है एक नाउम्मीदी। चलते चलते फिर दुष्यन्त कुमार की दो लाइनें और बात ख़त्म…
“जिस तरह चाहो बजाओ तुम हमें
हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं।”